सूत्र समाजिक संस्थान के साथ

पहला दिन!

मुंबई से चले तो सभी समय से बांद्रा स्टेशन पहुँच गए थे। हम दस लड़कियाँ सूत्र, सोलन के  लिए। ट्रेन जैसे ही चली हमने पाया की हममें से एक हर्षिता ठीक १२ बजे ही पानी लेने के लिए उतरी थी। सभी डर गए पर फिर उससे बात हुई तो तसल्ली हुई की वो लेडिस गेनरल डब्बे में चढ़ गई थी।

खैर सब सेटल हुए फिर लंच का समय हो गया। मम्मी ने बैगन की सब्ज़ी और पाँच पराँठे बनाए थे। ऐश्वर्या की रूममेट ने पूरी और आलू पैक कर दिए थे। तीन रेलवे की बिरयानी के साथ सबका लंच हुआ। रात के खाने के लिए रतलाम में नम्रता के घर से सबके लिए खाना गया। रोटी सब्ज़ी पुलाव। ऊपर से पेस्ट्री और हलुआ। अगले दिन के नाश्ते के लिए परमल(मुरमरे) प्याज़ टमाटर हरी मिर्च मँगवा लिए थे।

सुबह खूब बढ़िया भेलपूरी बनाई। फिर रात के हलुआ के साथ खाया। दिल्ली आया तो मोनिका और हर्षिता के घर से ढेर सारा खाना अगले दिन सुबह तक। बेसन के लड्डू, अनारदाना.. पूरा रास्ता घर का खा कर मज़े गए। हाँ नागालैंड की यांग्ति को तीनों समय चावल चाहिए थे। उसके लिए भी रात का तो इंतज़ाम हो गया था नम्रता की तरफ से।

दूसरा पूरा रस्ता सब अपने बायफ्रेंड से मिलनो की चाह भी पूरी करते गए। शुरुआत नम्रता ने की। उसका रतलाम में चढ़ा तो अगले स्टेशन में उतरा। रास्ते भर सभी लडकियों के खूब परेशान किया। फ़रीदाबाद में दूसरे है फिर दिल्ली में तीसरे का। कुछ के वीडियो चैट में कुछ फ़ोन पर।

रात १० बजे सुत्र कैम्पस धर्मपुर में पहुँचे। बहुत तेज़ ओले हवा से ठंड बढ़ गई थी। जैकेट मिला तो थोड़ा आराम मिला। तुरंत हाथ पैर धो कर गर्मा गर्म रोटी सब्ज़ी खा कर मै तो सो गए। कुछ लडकियों के नहाया और कपड़े धोए।

सुबह बजे उठ कर बाहर घूमने में बहुत मज़ा आया। जब तक लड़कियाँ उठी तब तक मेरा नहाना धोना सब हो गया था। 

:३० नाश्ते के लिए गए तो हर्षिता के घर की कचौड़ी पूरी के साथ आलू गोभी के पराँठे थे। फिर १० बजे से बजे तक पहले सुभाष जी का फिर निर्मला और लीला जी का शैशन हुआ। सभी के लिए बहुत ही enlightening था। बहुत कुछ चीज़ों को अब जोड़ पी रही हूँ।

सबके जानकारी के लिए बताना चाहूँगी की सुत्र ४० साल से हिमाचल में काम कर रहा है। इनका काम से ही सिर्फ हिमाचल सरकार ने ढेरों बदलाव किये है।

शाम को खूब ओले गिरे। पहली बार हमने फ़ेसबुक पर लाइव किया!

खाना सादा है पर घर का खाना जैसा!

कसौली घूमने

सुबह मैंने रसे के आलू बनाए। सादे पराँठे के साथ हम बस स्टॉप तक पैदल गये। बैग ले कर बहुत 

सोमा के पिता की मौत गले के कैंसर से हुई। वो महिला मंडल की सदस्य है। 

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