मदद माँगना बनाम बेइज़्ज़ती
शहर के एक बढ़िया कॉलोनी में दो मंदिर है। उसमें से एक हनुमान मंदिर पर एक पंडित पंडिताई करते आए है सालों से। बनवाया तो किसी लाला ने था पर जबसे वो स्वर्ग सिधारे है पंडित पूरे मालिक है।
पंडित का एक इकलौता बेटा है। बेटी की शादी करदी है। पंडितानी सालों पहले स्वभाग्यवती ही सिधार गई। बच्चों को दादी ने पाला। पंडित की माँ भी चल बसी तो घर पर रोटी बनाने के लिए वो एक बहु ले आए। बेटा होम्योपैथी डॉक्टर है। एक बार किसी घरेलू बहस में पंडित ने अपनी बहु की ख़ूब जूतों से पिटाई कर दी। उसने ग़ुस्से में हारपिक पी ली। समाज में भद्द होती इसलिए पंडित और उसके बेटे ने ख़ूब घरेलू इलाज करा। पर समय के साथ उसकी हालत बिगड़ती जा रही है। पंडित और बेटे ने उससे ये भी लिखवा लिया है की अगर उसे कुछ हुआ तो उसके लिए ज़िम्मेदार वो ख़ुद है। अब बेचारी जीना चाहती है पर हॉस्पिटल में जाने से डरती है। पंडित और अपने पति से छिप कर वो अपना इलाज करवाना चाहती है!
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