पहचान

हमारे समाज में सिर्फ़ पुरुष अपनी पहचान बनाने पर काम करता है। महिलाओं और बच्चों को बिना पिता/पति के नाम, जाति के नाम के बिना पहचान अधूरी रहती है। मैंने एक लिस्ट देखी तो पहली आपत्ति इस पर हुई की ऐसी लिस्ट में जहा हर बच्चा एक दूसरे की जाति देख पाता है, क्या सोच के ली गई। ही इस लिस्ट में जाति की ज़रूरत थी और ही पिता की पर क्या ये दोनों जानकारी ले कर बच्चों में भेदभाव नही बढ़ाया जा रहा। दूसरा क्या सिर्फ़ नाम और कक्षा काफ़ी नही था। बच्चों को जो सर्टिफ़िकेट भी मिलने है उसमें भी इससे ज़्यादा जानकारी नही चाहिए। 

  1. तलहेडी इंटर कॉलेज में त्यागियों (मुस्लमान) का लौंडा चेत दिया दिखे चमारों के लौंडों ने। साखन की किसी मुस्लिम लड़की को ले कर लठ्ठ चल गए। कल चमार के एक लड़के को लड़की के भाई ने चेत दिया।
  2. बुज़ुर्ग महिला मर गई। आज ले कर आए है। यहा मायका था। द्ययोती (बेटी के बेटी) के रहती थी। वही मर गई। चार लड़के थे वो रखते नही थे। अपने भाभी के घर रही कुछ दिन, चाची के घर भी रह पाई। कोई रखता था बेचारी को! भाई भतीजे सब गए, वैसे रोटी का टुकड़ा कोई देता था।
  3. जोगियों की १३ साल की लड़की थी और पड़ोस का १८-१९ साल का गुज़र का लड़का। लड़की बिना कपड़े के रोती चिल्लाती पाई गई। जोगिनों ने चार लाख माँगे केस करने के। गुज़र दे नही पाए तो लड़का पकड़ा दिया!
  4. पड़ोस में एक चमारों का लड़का था, बहुत पीता खाता था और लौड़ियों में जाता था, औरत के तीन भाई आए राखी पर इतना चेता की पूरा शरीर नीला पड़ गया। फिर भाई बहन को ले कर चले गए, वो रोकता रह गया। पीछे लड़के ने दवाई (ज़हर) खा लिया और मर गया। अब वो वापस गई है तीन बच्चों के साथ रही है। अभी भाई ख़र्चा उठा रहे है आगे का पता नही क्या होगा।
  5. गाँव की अभी की प्रधान मीना खातून अनपढ़ है, लड़का करता है प्रधानी। मैं भी लड़ी थी चुनाव, आठवीं पढ़ी हूँ दुकान चला रही हूँ। पति ब्लॉक ऑफ़िस में है। ये गाँव के छोटे प्रधान है। ख़ूब चलती है इनकी। पहले प्रधान की इज़्ज़त होती थी अब प्रधान का डर होता है। अब पैसा का खेल है। पहले सामाजिक होते थे अब तो दबंग होते है बस। महिलाएँ तो नाम भर के लिए है!

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