धर्म और नफ़रत

जब भी मुस्लिम लोगो के प्रति अपने लोध जाति के लोगों में नफ़रत देखती हूँ तो लगता है कही कुछ गड़बड़ है। मेरा बचपन हैदराबाद मे बीता। मेरी सबसे प्यारी सहेली तय्यबा खान हमारी पड़ोसी भी थी। पापा के सबसे नज़दीकी दोस्त असलम अंकल कश्मीरी थे। उसकी शादी मे तो हम पंद्रह दिन के लिए श्रीनगर भी गए थे। बाद में बरेली में रहे तो और बहुत से पापा के छात्र और मेरी इंटर की सबसे अच्छी दोस्त रूबी भी मुसलमान थी। शिवी की भी अच्छी सहेली मुस्लिम ही है!

नज़दीकी से देखूँ तो हमने मुस्लमानो से कभी नफ़रत नही की। मुग़लों की सेना में बड़ी संख्या में लोध सिपाही होते थे। उन्हीं की वजह ये उत्तर प्रदेश से लोध देश के बाकी हिस्सों में मिलते है। मुग़ल सेना के साथ पूरे पूरे लोध गाँवों का माइग्रेशन हुआ। शेरशाह सुरी के समय बहुत से लोध, जागीरदार और छोटी रियासत के राजा बने। अंग्रेज़ों की राजपूत और जाटों से तो बहुत घनिष्ठता थी पर उनके नोट्स और किताबों में लोध ठग, डकैत की तरह देखे गए क्योंकि उन्होंने अंग्रजों से संघर्ष किया (जो अब सही तरह से पेश हो गया है, किम वैगनर की ठगी की किताब पढ़िए

अगर ये सब इतिहास है तो क्या है की लोध आज RSS के तलुए चाट रहे है। उनकी नफ़रत को वो आपके द्वारा पूरी कर रहे है। समझिए ब्राह्मण हमेशा भला बना रहेगा पर सारे गलत काम बेवक़ूफ़ जनता से करवाएगा।

अब लोग अपना ही इतिहास भूल कर बेवक़ूफ़ बनने पर आमादा है तो कोई क्या कर सकता है। ये नफ़रत की राजनीति लोधों की राजनीति नही हो सकती। लोध बहुत ही सरल पर लड़ाकू जनजाति रही है, बस हमारी कमियों का कौन फ़ायदा उठा रहा है उसके लिए ख़ुद को टटोलिएगा तो जवाब मिल जाएगा।

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