दलित बनाम ब्राह्मण
ये समाज ऐसे लगता है सिर्फ दो केटेगरी में परिभाषित होता है। एक ब्राह्मण और दूसरे दलित। अख़बारों में शोशल मीडिया में रिसर्च में एकैडिमिया में इन्हे छोड़ बाकी सब गायब है। गरीब से गरीब ब्राह्मण हो पर अपने से ऊपर किसी को नही देखना चाहता। अमीर से अमीर दलित हो पर अपने से नीचे किसी को नही देखना चाहता। दलितों में भी कुछ एक जाति। एक जातिय दंभ पर इतराती है तो दूसरी जातिय हीनता को हथियार बनाती है। आदिवासी किसान विमुक्त और घुमंतू जातियाँ क्या है, उनकी क्या समस्या है, उनका शोषण किन तरीक़ों से हो रहा है, उनका शैक्षिक बौधिक आर्थिक स्तर क्या है, उनकी क्या ज़रूरतें है, उनका धर्म को ले कर क्या धारणाएँ है, उनका इतिहास क्या है, उनके रीति रिवाज क्या है, वो है भी की नही, ये सब हमारे चिंतन से ही गायब है! इनके गाँवों के जलाने की ख़बरें, इनके छिनते रोज़गार की ख़बरें, इनके जल जंगल जमीन छीनने की ख़बरें, इनको दफ़नाने तक के लिए ज़मीन की कमी की ख़बरें, इनकी प्रदेश/दश की नागरिकता की ख़बरें, इनके कुपोषित बच्चें और आत्महत्यों की ख़बरें, इनको नक्सली या अपराधी घोषित करने कि पीछे की सोच, इनके श्रम और पैदावार को उचित मूल्य न देने की ख़बरें, इनके योगदान या एक-आध उप्लब्धी की खबरे - सब गायब है! इनसे जो दो-चार बौधिक निकले है वो भी अपनों को छोड़ उन्ही दो की बात करते है। इनपर नज़र न सरकार की है, न तंत्र की है, न सरकारी स्कीमों में इन्हे जगह मिलती है, न सिविल सोसाइटी के प्रयासों में और न हम आप की बातों में। ऐसे लगता है मुश्किल से आठ दस प्रतिशत की आपसी तनातनी में बाकी का चूरमा बन गया है।
शोले का डायलॉग याद आ गया जेलर वाला। आधे इधर (ब्राह्मण की साइड) आधे उधर (दलित के साइड) ; और बाकी हमारे पीछे!
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