लोध किसान

हम लोध मुल: एक कृषक जनजाति है। ये रिकार्ड में है की कृषि के क्षेत्र में बाकी अन्य जातियों से कही आगे है। एक पुरानी कहावत भी है की दो बीघा ज़मीन मे लोध उतना अनाज पैदा तर लेता है जितना जाट नौ बीघा में और गुज़र बीस बीघा में करता है।

आज़ादी के बाद जब शिक्षा फैली तो पहले गेनेरेशन में बहुत से लोग कृषि विज्ञान और उससे जुड़े फ़ील्ड में आए। हमारे पिताजी ने १९६१ में उन्नीस साल की ऊम्र में पूसा इंस्टिट्यूट से MSc Agriculture किया था। शायद उस समय हरित क्रांति की वजह ये उसकी ज़रूरत भी बहुत थी। लोधियों की जनसंख्या बढ़ी और बहुत ज्यादा लोग गाँव से शहर आने लगे। शहर में संभावनाएँ बड़ी तेज़ी ये बढ़ भी रही थी। फिर शहर की चमकदमक ने भी लोगों को ज़मीन बेच कर शहरों की तरफ पलायन किया। 

शहरों में आना अपने में बहुत सकारात्मक नही था। अपनी संस्कृति छोड़ वहा के ब्राह्मणवादी सोच के ग़ुलाम बनते गए। 

खैर मै माँ होने की वजह से फ़ोकस बच्चों के कैरियर चौइस पर दिलाना चाहती हूँ। ये बहुत ही ज़रूरी विषय है जिसपर गंभीरता से विचार होना चाहिए। सबसे पहले ज़रूरत सच को स्वीकारने की है।

  • लोधियों ने अभी भी साक्षरता की भारी कमी है। लड़के पढ़ रहे है पर लडकियों की पढाई पर बिलकुल ज़ोर नही है। आप एक पीढ़ी की लडकियों को पढ़ा कर आगे जाने कितनी पीढ़ियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है।
  • बच्चे क्या पढ़ रहे है वो भी बहुत ज़रूरी है। आज लड़कों में ढेरों इंजिनियर मिलेंगे पर बाकी विषय में आकाल है। लडकियों को थोड़ा बहुत इसलिए पढ़ा दिया जाता है की लड़का ठीकठाक मिल जाए!
  • समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, मनोवैज्ञानिक, मीडियाकर्मी और अन्य बुद्धजीवियों की भारी कमी है। अगर है तो उन्हें बढ़ाने की सख्त ज़रूरत है। 

हम सब अपने समाज का भला चाहते है। है न। तो बदलाव कैसे होगा? आज के ग्लोबलाइज़ेशन में ख़ुद को क्षत्रिय या राजपूत साबित करके कुछ मिल जाए तो मुझे जरूर बताइएगा! बदलाव होगा अगर समाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रगति होगी। चलिए एक एक की बात कर लेते है। शुरुआत हमारे स्ट्रोंग पॉइंट से!

राजनैतिक प्रगति: ये तो गाँव, शहर, क़स्बा सब जगह मिल जाएगी। लोकल लेवल पर समाज भी काफी कार्यशील है। काफी ज़मीनी, प्रांतीय और नैशनल नेता और एक्टिविस्ट मिल जाएँगे। ये ज़रूरी है पर इनके होने भर से समाजिक-आर्थिक बदलाव नही हो सकता।

समाजिक प्रगति: इसमें हम सबसे ज्यादा पिछड़े है। शिक्षा, स्वास्थ, लैंगिक समानता के सभी इंडिकेटर ने बुरा हाल है। उसके ऊपर से समाजिक बुराइयाँ जैसे दहेज, लैंगिक  और परिवारिक हिंसा, रिश्वतख़ोरी बढ़ रही है!

आर्थिक प्रगति: समाजिक बदलाव अपने साथ आर्थिक बदलाव लाती है। वो होगी तो अच्छी नौकरी लगेगी, बिज़नस खड़े होगे और स्वाभिलांभन बढ़ेगा। बच्चो को ऑटोनमी और सही गायडेंस मिलेगी तो वो अपने पसंद और क्षमता के हिसाब से पढ़ाई और काम करेंगे। ऊपर दिये गए नए क्षेत्रों में उच्च शिक्षा हासिल करेंगे। अपनी जाति पर जो समाजिक समझ का अकाल है उसे थोड़ी राहत मिलेगी।और रिसर्च होगा तो आगे बढ़ने के और रास्ते खुलेंगे

नही चल पा रहे है। आज जब दुनिया ऑर्गेनिक खेती की तरफ जा रही है और उसका बाज़ार बढ़ता जा रहा, हम अभी भी हरित क्रांति के तरीक़ों में अटके हुए है। कारण सही शिक्षा की कमी हम बदल नही पा रहे है। 

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