विमुक्त जाति

७ सितम्बर को उमाजी नाईक के २६६ वा जन्मदिन पर TISS में ६६ वा विमुक्त दिवस बनाया गया। अब जितना मैने कहा उसमें बहुत से नाम/ शब्द आप पहली बार सुन रहे होगे!
पहला नाम उमाजी नाईक से शुरु होते है। ये कौन? न तो किसी इतिहास के किताब में है और न ही इनकी किसी भी जयंती ता ज़िक्र सुना! ये अंग्रेज़ों के ख़िलाफ लड़ने वाले पहले स्वतंत्रता सेनानी थे! ये रामोशी जाति के थे! 
है न विडम्बना की हमारा इतिहास मूल नायकों को दबाए हुए है!
अब आते है विमुक्त दिवस पर। ये क्या है? कोई तो नही बनाता, है न? अंग्रेज़ों को सबसे ज्यादा लोहा देनी वाली जातियाँ जैसे रामोशी पार्धी लोध को एक कानून के तहत अंग्रेज़ों ने जन्म से अपराधी घोषित कर दिया था।और पूरे देश में ऐसे सेटलमेंट बनाए (नाज़ी कंसेनट्रेशन कैंप की तरह) जहा औरतें बच्चे बूढ़े सब को घेरा लगा कर बंद कर दिया था। वहा दिन में चार बार सबको हाजरी देनी होती थी की लाट साहेब आज हमने कोई ठगी नही की! ये दुनिया का पहला जेल था जहा पैदा होते ही बच्चे को अपराधी का टैग माथे पर लग जाता था! अंग्रेज़ सरकार ने यहा तक ये भी प्लान बना लिया था देशभर की सारी अपराधी जाति को जहाज़ में पहुँचा कर उन्हें डुबा दिया जाए। इसकी तो इसाई रानी ने अनुमति नही दी हज़ारों को फाँसी और काला पानी मिला। बहुत से मारे गए लोगों के सर इंग्लैंड में स्टडी (physiognomy) के लिए स्पेसिमेन की तरह भेजे गए! 
देश आज़ाद हुआ पर इनके लिए कुछ नही बदला। ३१ अगस्त १९५२ यानि आजादी के पाँच साल बाद १८७१ का क्रिमिनल एक्ट ख़त्म हुआ पर उसे अभ्यस्त अपराधी कानून (habitual offender act 1952) से बदल दिया। आज भी आईपीएस एकैडमी में पार्धी कैसे अपराध करते है ये पढ़ाया जाता है! किरण बेदी जैसी अफ़सर अपराध बढ़ने पर क्रिमिनल ट्राइब की बात करती है!
अब आते है इन जातियों के आज की स्थिति पर। सबसे बड़ी समस्या इनकी डोमिसाइल की है। बहुत सी घुमंतू जाति आज भी साल के बारह महिने एक राज्य में नही रहती। हमारा राशन आधार सेंसस जाति प्रमाण सब डोमिसाइल पर है। आज तक इनका कोई सेंसस नही हुआ है! मेरे दिल्ली के रिसर्च के लिए डेटा कलैक्शन में दो ऐसे परिवार मिले जिनके परदादा और अन्य गाँव वाले अपने मैनपुरी और ग्वालियर में पैत्रिक गाँव के सेटेलमेंट से रातों रात भाग कर देहरादून और करनाल में नई आईडेंडटी के साथ सेटल हुए। ऐसे देश भर में पचास से ज्यादा सेटेलमेंट थे। नई जगह सेटल होना भी आसान नही होता। टेम्पररी घरों में ये दर दर भटकते रहते थे। बहुत सी जाति जो दफ़नाती है उन्हें हार कर अपनों को अपने टेंट के नीचे ही दफ़नाना पड़ता है! लोग सिटिज़नशिप  राइट्स की बात करते  है तो भूल जाते है कि न जाने कितने nt-DNT आज तक इस देश के नागरिक नही है।
२००८ में अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने महाराष्ट्र सरकार की तरह NT-DNT कमीशन बनाया। NT यानि घुमंतू जाति (nomadic tribes) और DNT यानि विमुक्त जाति (denotified tribes)! महाराष्ट्र में १९६० से कमीशन होते हुए भी न तो लोकल लेवल पर और न ही स्टेट लेवल पर कोई representation है। न ही आज तक कोई अलग बजट मिला। न ही कोई इनका कोई atrocities act है sc-st की तरह! रेनके कमीशन ने रिकमेंडेशन दिये जो अलग schedule की बात करते है NT-DNT की जाति की लिस्ट और बहुत सी ज़रूरी मानव अधिकार की बातें करते हैं पर एक और कमीशन बैठाया जाता है जो घूम फिर कर बात वही आ जाती है। क्योकि SC और ST की लॉबी इतनी मज़बूत है की उनके लिए उनसे नीचे किसी को रखना मंज़ूर नही है। जो घुमंतू और विमुक्त जातियाँ आज SC या ST का हिस्सा है उन्हें तो उसका लाभ नही मिल रहा है पर जो ओबीसी या गेनरल में है उनका तो और बुरा हाल है! तो तरीक़ा सिर्फ़ एक ही है जिसके लिए संविधान में फेरबदल करनी होगी जिसके लिए दो तिहाई बहुमत से पास करना एक बहुत बड़ा संघर्ष है।
तो क्या रास्ता है NT-DNT की तमाम जातियों के पास:
- ज़मीनी संघर्ष - अनुमान के आधार पर १५% जनसंख्या NT-DNT की है जो एकजुट हो कर अपनी विजिबिलिटी बढ़ा सकती है
- सेंसस और टेरिटरी के मुद्दों को ज़मीनी स्तर पर एडवोकेसी करना
- ज़मीनी रिसर्च ताकि सच्चाई ज्यादा से ज्यादा बाहर आए
- इंटरनैशनल बॉडीज से ह्यूमन राइट्स वायलेशन पर आवाज उठवाना
- पोलिटिकल लीगल मीडिया - हर तरीक़े ये आज के सिस्टम में अपनी आवाज को बुलंद करना
- इनकी शिक्षा स्वास्थ ज़मीन घर के लिए नियंतर प्रयास करना
जैसे लक्ष्मण गायकवाड जी जो महाराष्ट्र और राष्ट्रीय स्तर पर ये लड़ाई बहुत सालों से लड़ रहे है और उन्हें सरकारें चोर उच्चकों के सरदार की तरफ संभोदित करती है का कहना था - हमने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ सबसे पहले हथियार उठाए थे पर अब हमें मजबूर मत करिये की हमें फिर अपने हक के लिए दोबारा ये करना पड़े। हमें भी संविधान का हिस्सा बनाते हुए हमारे हक़ों की रक्षा हो! क्यो दोस्तों देश को आजादी दिलाने वाले नायकों के प्रति कुछ तो हमारा सबका उतरदायीत्व बनता है!

नाम में सिंह लगाना, टोले के बाहर ख़ुद को क्षत्रिय राजपूत कहना, आरएसएस से संरक्षण लेना - ये मात्र जीवित रहने के तरीक़े है! गाँवों में जा कर देखो अपनी संस्कृति नही छोड़ी है हमने! ये सब नही करेंगे तो असली पहचान की वजह से कुत्ते के मौत मारे जाएँगे और किसी को पता भी नही चलेगा। न मीडिया न पुलिस न सरकार न तथाकथित सभ्य समाज - किसी के लिए भी हम इंसान नही है!
#fuck_HumanRights #dnt

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