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फ़रवरी, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सशक्तिकरण के अवरोध

"A big part of justice is understanding, or trying to understand, the emotional landscape of others." Teju Cole. डर कितना डरावना लगता है जब तक वो हम पर हावी होता है। कल शाम तीन किशोरियों का मन हुआ की हम उन्हें दौड़ा कर लाए। बढ़ती उम्र में लड़कियों को घर से निकालना बंद जो हो जाता है , सो सबसे पहली डिमाण्ड यही होती है , बाहर चले ? हमें भी पता है चाहे पूरे दिन गतिशील होने के महत्व को समझाया जाए पर जब तक अनुभव न हो तब तक सब बेमानी है। तीनों १२ - १४ साल की थी पर दौड़ना शुरु किया तो मानसी दौड़ नही पा रही थी। कमजोरी के साथ दो मिनट में उसकी साँस फूलने लगी। कहने लगी मुझे नही जाना , थक गई मैं तो। हमनें कहा चलों कोशिश करो। जैसे तैसे २०० मीटर चले होंगे तो बहुत तेज़ आधी आने लगी और अंधेरा हो चला। मानसी बहुत बूरी तरह डर गई। " मुझे नही जाना , पेड़ गिर जाएगा , घर चलो !" हमनें कहा नही गिरेंगे तो  बोली  मेरी दीदी ने बताया कि आँधी में पाँच ...

रांड लोगनियाँ

लोगनियों को मार दे जल्दी मर्द न मरे! रांड लोगनियों की तो ज़िंदगी नर्क कर देते है जाकत। मैने चार बीघा न दी किसी को तो पूत कहते है कि इसे गांड में घुसा कर खाड़ी हो जा।

शक का दीमक

"मैंने तो बहन के देवर के दिल की बात की। अगर मैने कोई गलत बात कही हो तो मुझे ज़िंदा गाड़ दे। अगर ये सब देखना था तो घर बैठी ठीक थी, दो जाकत के धेजू के साथ क्यों गई। मैने क़सम खा रखी की जब तक ख़ुशी से नही ले जाता मैं रोटी नही खाने की। पहली रस्सी डाल के मर गई, मैं भी इकर मर जाऊँगी। माँ बोली हम भी नही करने बात जी कर तू रिकॉर्डिंग करे। फिर भी नही माना।"  ये आज का तीसरा केस है जहा शक की बीमारी ने रिश्तों में खाई बना रखी है। कारण मोबाइल पर किसी से मन की बात करना। पुरुष औरत को अपनी निजी सम्पति समझना कब बंद करेगा!

बीमार समाजिक संस्थान

जन संपर्क करना और लोगों के साथ काम करने के साथ कभी मात्रात्मक नियंत्रण नही किया जा करता है। पर जो भी ग़ैर सरकारी या सरकारी संस्थान कही से भी   फ़ंड लेती है वो मात्रात्मक मूल्यांकन ही करते या करवाते है। गुणवत्ता का मूल्याँकन करना है तो वो गुणात्मक आडिट द्वारा ही किया जा सकता है।   चाहे किसी कॉर्पोरेट का सेल्स जॉब हो या किसी समाजिक संस्थान में ज़मीनी काम सिर्फ़ दो चीज़ें देखी जाती है - कहा / किससे संपर्क किया और वो पूर्ण रूप से संपन्न हुआ की नही। दोनों ऐसे है जिसका सच सिर्फ़ कार्यकर्ता और क्लाइंट के बीच रह जाता है। न ही कार्यशैली पर ध्यान दिया जाता है और न ही निवेश में जिसमें कार्यकर्ता की कार्यक्षमता और उसे कार्य कुशलता से करने के लिए उपयुक्त जानकारी और ज़रूरी सुविधाएँ मुहैया करवाई जाए। बदलाव हर कोई चाहता है इन सब के बावजूद ज़ोर सिर्फ़ योजनाबद्ध उद्देश्यों पर होता है। एक अजीब सी दूरी बना लेती है समीक्षा समिति हर ज़मीनी ...