ये दीवारें कब टूटेगी?

सहारनपुर के पिलखुआ इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य ठाकुर साहब और हमारे बीच की चर्चा!

"लड़के रंगोली नही बनाएँगे।"

"क्यों सर?"

"आप समझदार है समझ जाइए।"

"ऐसा क्या है सर। हमारे मेले का तो उद्देश्य ही यह है की लैंगिक समानता हो। लड़के भी लड़कियों वाले कहे जाने वाले काम करे।"

"नही यहा हम लड़के लड़कियों को मिलने नही देते। को-एड स्कूल चलाना आसान नही है। इनके प्लेग्राउंड भी अलग है।"

"पर मिलने नही देंगे तो एक दूसरे के प्रति संवेदनशील कैसे होंगे?"

"अरे आप तो एक दिन के लिए आए हो। कुछ ऊँच नीच हो गई तो संभाला तो हमें पड़ेगा!"

"अरे सर १५-१६ साल के बच्चे ज़िम्मेदार हो जाते है बाकि हम पूरी ज़िम्मेदारी लेते है की कुछ नही होगा। आप मौक़ा दीजिए!"

"चलिए भेजते है पाँच लड़कों को।"

"हमें तो पूरे पंद्रह चाहिए। बाक़ी रंगोली हम बनवा लेंगे।"

बग़ल में खड़ी लेडी टीचर धीरे से,

"मुझे कोई दिक़्क़त नही है। चलिए करवाते है!"

कल सर्टिफ़िकेट लैमिनेशन करवाने देर शाम को पास के मार्केट में गई। दो लड़के फ़ुरसत में बैठे थे। एक तैयारी कर रहा तो दूसरा सर्टिफ़िकेट देखने लग गया। एक में फ़ोटो देख कर बोला,

"ये सर्टिफ़िकेट आपके है?"

"हाँ परसों ही मिले है!"

"और आप इतनी जल्दी लैमिनेशन करवाने भी गई। लोग तो जब बुरी तरह फटने लगता है तब आते है।"

"हाँ हम डिग्री को क्या पढ़ाई को भी कहा ज़्यादा अहमियत देते है।"

"सही कह रही है। लड़कियों की तो और नही। माएँ नही पढ़ी होती तभी बच्चे भी आगे नही बढ़ पाते।"

"हाँ और पढ़ाई तो हर उम्र में हो सकती है। काम करते हुए भी। हमने भी 45 साल में पोस्ट ग्रॅजुएशन किया हैं। उसी के सर्टिफिकेट हैं।"

"हाँ पर लड़कों को जो नही पढ़नाउसके लिए माँ बाप धक्का देते है इसलिए हमको तो पढ़ाई के नाम पर सरदर्द होता था।"

"हाँ जो सबजेक्ट पसंद हो और जिसमें आप अच्छा कर सकते हो वही पढ़ने चाहिए!"

"लड़कियों को कोई पढ़ाई के लिए पूछता नही इसलिए वो आजकल हर जगह अच्छा कर रही है!"


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