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नवंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मीडिया में स्त्रीद्वेश

 किस किसको इन न्यूज़ हेडलाइन में स्त्रीद्वेश नही दिख रहा! - प्रेमी संग लॉज के कमरे में पहुँची छात्रा - पत्नी प्रेमी संग भागी, बरामदगी को दो साल के भटक रहा पति - अश्लील हरकत करती दो युवती पर पुलिस ने लगाया लूट का आरोप - शिक्षिका पर मारपीट का आरोप - दुष्कर्म पीडिताओं को अछूत समझना गलत - दहेज हत्या के मामले में कारागार में बीमार महिला की मौत इसपर सवाल करें और बदलने की ज़रूरत है! - ये गलत कैसे है? - उसे और कोई काम नही है! तलाक़ दे अगर वो नही आ रही तो! - ये गलत कैसे है? - किसी शिक्षक की ख़बर निकलती? ज्यादा वो करते है। हिमाचल के एक स्कूल में देखा कितनी बेहरहमी करते है! - दुष्कर्म पीड़ित कब तक कहोगे सुप्रीम कोर्ट?? संघर्षशील महिला जिसके साथ पुरुष ने बलात्कार किया, कहना होगा! - दहेज हत्या में दोषी महिला कब से हो गई!

ब्राह्मणवाद की खरपतवार

 त्रिपाठी जी और पांडे जी लोगों के नाम पर हँस रहे है। नाम जैसे ग़रीब, जूठन, झंगार, गुदोलिया और उनसे जुड़ी कहानी। जो नाम पंडित से रखवाए तो ऐसे ही नाम दिए जाते थे। कारण दिया जाता है कि नही रखा तो बच्चे मरते रखेंगे।  "हम ब्राह्मण है खाना पहुँचा दो तो पुण्य मिलेगा। ठाकुर नही है की बोटी शोटी मँगवाए। पनीर पराँठे ले आओ बस दोस्त। आ जाना!" ही ही ही फँस गया हो गया जुगाड़ आज का! जूहू चौपाटी में चना बेचने वाले जब मुंबई से गाँव आते थे तो लाल मोज़ा, मुँह के साइड में सिगरेट और बग़ल में रेडियो दबा कर गाँव में घूमते थे। ये नीची जाति वालों को बड़ा दिखने के नए नए शौक! और सबसे बड़ा शौक़ बात बात पर पंडित से जजमानी करवाना। जैसे ठाकुरों की शादी होती है वैसी बरात निकालना! एक पंडित जब आपका जजमान बनता है तो आपके उद्धार का दाइत्व लेता है। जो ग़रीब ज़जमानी न करा सके तो और दरिद्र हो जाए तो जजमानी न करना थोपा जा सकता है और जो समृद्ध जजमानी करवाए उसकी हर सफलता को कारण मिल जाता है। कर्म के सिद्धांत से जोड़ दो और जजमानी करवाना दान देना सब अच्छे कर्मों में जोड़ दो तो गीता साक्षात सत्य हो जाती है! जो न करवाए उस...

दलित पितृसत्ता

 अभी थाने से आ रहे है। वो जो ख़ुद को दलित नायक कहते है, क्या ये सब सही कर रहे है? - पहली पत्नी को लगातार प्रताड़ित करना फिर उसकी बेटी पैदा होने पर मौत पर तीन महिने के अंदर अपने से बीस साल छोटी से शादी करना! - अपनी दूसरी पत्नी को भी बेटा न होने पर लगातार प्रताड़ित करना!  - पत्नी को लगातार धमकी देना की किसी अन्य लडकी को साथ रखने दे नही तो उससे कोर्ट मैरेज कर लेगा - पत्नी को अकसर इतना पीटना की उसका पूरा शरीर नीला हो जाए! - पत्नी का सामान घर के बाहर फेंकना और बात बात में कहना की घर से निकल जा - ये सब भी जब कमाने वाली पत्नी है और ख़ुद उन पैसों से सिर्फ राजनीति करनी है! - एक धोखा खाई लडकी की मदद के बहाने उसका शोषण करना। उसे प्रधान बनाने का लालच देना। पत्नी को कहना की इसको प्रधान बनाउंगा और प्रधानी ख़ुद करेगा! - अपनी मौसी के प्रधान होने पर भी भीम आर्मी में खुद को प्रधान के नाम से संबोधित करवाना! - सास के पूजा के स्थान को ठोकर मार कर तोड़ देना! - तीज-तेरहवीं बनाने पर सास-ससुर का अपमान करना! - ससुराल में कृष्ण की फ़ोटो को देख उसे गाली देना!

मुश्किल समय (कोविड)

 पहले से ही बोलना चाहूँगी कि हो सकता है मेरी ये पोस्ट काफ़ी लोगों को पसंद न आए पर लगा ये ज़रूरी है इसलिए लिखूँगी। लम्बी होगी पर पढ़ लीजिए क्योंकि ये बिलकुल  समकालीन मुद्दे पर है।  आज से लगभग अस्सी साल पहले 1943 में बंगाल में भुखमरी (famine) हुई थी। उसका कारण न तो अनाज की कमी थी और न ही ग़रीबी। उसका कारण एक कृत्रिम कमी थी जो लोगों द्वारा ही बनाई गई थी। जो भी अर्थशास्त्र के छात्र होंगे वो माँग पूर्ति स्थिति को समझते होंगे। वो जमाख़ोरी को भी बेहतर तरीक़े से जानते होंगे। कितनी भी सरकार को गाली दे दीजिए पर ये जान लीजिए कि कोई भी संसाधन कभी भी असीमित नहीं होते!  जमाख़ोरी शब्द सुनने में बड़ा नकारात्मक लगता है पर हम सब इसके दोषी रहे है, और ये बिल्कुल स्वाभाविक है। सोचिए जब नमक जैसी वस्तु के ख़त्म होने की खबर से दहशत फैलाई जा सकती है तो बाक़ी सब का क्या ही कहना। अब ये खबर आप को मिली तो आप क्या करेंगे बग़ल की दुकान ने तुरंत जा कर उसके पास के आखरी बचे दो पैकेट ख़रीद लेंगे चाहे आपके पास दस दिन के लिए नमक हो। आपको इस बात का तनिक भी आभास नहीं होगा कि अगले ही पल जो बेहद ज़रूरतमंद ग...

औरत तेरी यही कहानी

  बीरा के तीन बेटी थी। पति सभी आसपास के आदमियों के तरह बहुत दारू पीता था। थोड़ी सी ज़मीन थी वो भी बेच दी। पर अब बात यहा तक पहुँच गई थी की घर की सामान भी बेच देता था। कुछ कहने पर बीरा की इतनी पिटाई होती की वो अब चुप रहती, मज़दूरी कर किसी तरह सबके पेट भरती। बडी बेटी चौदह की हुई तो एक तीस साल का लड़का मिला उससे शादी कर दी। एक दिन उसके घर में पति एक दूसरी औरत ले आया और बोला तू बहुत किट किट करती है। मन तो मेरा यही बहलाती है। एक दिन खेत पर मज़दूरी करके वापस आई तो उसे पता चला उसकी दोनों छोटी बेटी कमरा बंद कर रो रही है। एक नौ साल की थी दूसरी ग्यारह की। दोनों का उसके पति और एक रिश्ते में बाबा लगने वाले ने दारू पी कर बलात्कार कर धमकी दी की किसी को बताना मत। वैसे वो पहले भी कर चुके थे अकेलियों का। पर आज पति की प्रेमिका के सामने दोनों का हुआ था। बेटियों की बात सुन बीरा पूरी तरह टूट गई। वो एक महिलाओं के संघ समूह से जुड़ी थी। ये समूह एक निजी ज़मीनी स्वमसेवी संस्थान के बनाए हुए थे। वो किसी को बताती या मदद लेती इससे पहले बात गाँव में फैल गई। दूसरे बलात्कारी का एक भाई उसी समाजिक संस्थान में ज़मीनी ...

लड़की की गलती

बलात्कार! रेप!  हम में बहुत है जो इस वाक्यों से निकल कर बाहर आए है। मैं औरों के बारे में नहीं कह सकती पर निजी अनुभव से कह रही हूँ हादसे कोई भी हो हम पर उसका असर शारीरिक से ज़्यादा मानसिक होता है। और मानसिक असर पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि समाज उसे कैसे देखता है। जैसे अगर लड़की बेरोज़गार होती है तो उसपर वो दवाब नहीं रहता जो लड़कों पर होता है। रेप को इज़्ज़त से जोड़ हमने उसे और भयावह बना दिया है। इसी लिए कमजोर पुरुष भी रेप कर अपना पावर दिखा कर खुद को खुदा समझने लगता है। रेप कोई अजनबी करता है तो इतना भारी सदमा होता है। लड़की भी पूरी तरह खुद को झोंक देती है अपनी इज़्ज़त बचाने में।  होने के बाद सबमें इतना सारा आक्रोश भी दिखने को मिलता है। पर जब अपना पति, बॉयफ़्रेंड या रिश्तेदार करता है तो अकसर समाज ही उसे नज़रअंदाज़ करता है। जिसे नज़रअंदाज़ किया जाता है वही इन वहशियों को शह देता हैं कि अजनबियों के साथ वही दरिंदगी दोहराई जाए!!! जब मैं अलग-अलग प्लैटफ़ॉर्म पर महिला सुरक्षा की बातें सुनती हूँ तो मुझे बहुत ही काउंटर प्रोडक्टिव बातें लगती है। पुरुषों की सोच बदलने का प्रोजेक्ट इतना बड...