लली ओढ़नी ओढ़ ले...!
ब्रा का फ़ेसबुक पर पूरा हौवा बना के रखा है। पहले समझे की ब्रा है क्या? ये एक कपड़ा है जो महिलाएँ अपने वक्ष को शेप में दिखाने के लिए पहनती है। किसे दिखाने के लिए? ज़ाहिर है औरतों के लिए तो नही। वो जानती है औरतें को वक्ष हर सेप साइज़ के होते है और समय के साथ बदलते है। हर प्रेगनेंसी में बदल जाते है। वो ये भी जानती है की वो पहन कर वो खुल कर साँस नही ले सकती। जिसने पुरानी अंग्रेज़ी फ़िल्में देखी हो - कैसे कस कस के कॉर्सट पहना जाता था। सब पुरुष को रिझाने के लिए! आज जिसने ब्रा दिया वही वेस्टर्न औरतें उसे जला रही है। भारत में तो ब्रा पहनने वाली ही ३०% औरतें होगी। ये भी वो है जिनकी माँ/ दादी ने कभी ब्रा नही पहनी। हमारी लड़ाई अलग है।
आज के शहरी पुरुष के लिए ज़्यादा उत्तेजित खुला वक्ष नही बल्कि उसे खोलना है। इसलिए लोन्श़रे को एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट की तरह दिखाया जाता है। बॉयफ़्रेंड का पहला इंटिमेट गिफ़्ट लोन्श़रे होता आया है।
अजीब बात है न आदिवासी समाज में जहा ज़्यादातर खुले वक्ष के साथ रहती है किसी एक का ब्लाउज़ पहनना समाज में अलग दृष्टि से देखा जाता है जैसे यहाँ पर नेकेड निकलना। कपड़े संस्कृति का हिस्सा है जो घर कम्यूनिटी और समाज के सामंजस्य से तय होता है। इसका नारीवाद से सिर्फ इतना नाता है की ये सब पितृसत्ता के अनेकों आयामों में से एक है।
मैंने अपने रिसर्च में एक सवाल कपड़ों पर रखा था। बाहर जाते में क्या पहनते है। एक तरफ़ औरतें जहा शहर में आ कर माहौल के हिसाब से सलवार सूट पहनने लगी है बहुत सी जो ग़रीब बस्ती में है वो साड़ी ही पहनती है। जबकि लड़कियाँ ज़्यादातर सब जींस टीशर्ट पहनती है बस पॉश इलाक़े वाली टेंक टॉप और शॉर्ट पहनती है। पर लड़कियाँ औरतें माहौल की ज़रूरत के हिसाब से कुछ भी पहने, सिर्फ कपड़े हमारी स्वायत्ता नही तय करते। इसी तरह औरत ब्रा पहनती है या नही ये उसकी एंपावरमेंट की निशानी नही है।
सही एंवावरमेंट इसमें है की हम कुछ भी पहने हम उसपर जज न किए जाए। इसमें है की पुरुष के सुरक्षा चक्र के घेरे से बाहर आए ताकि वो अपनी सुरक्षा के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हो। इसमें सिर्फ ड्रेस कोड नही, वो कहा जा सकती है कहा नही, उसकी पढ़ाई, उसके खानपीना और स्वास्थ्य, उसके रोज़गार में पुरुष से कोई भेदभाव न हो। और ज़रूरी है उसकी देह की आज़ादी - मासिक के समय कोई भेदभाव न होना, सेक्स में कंसेंट, बच्चे कब हो कब एबोर्ट कराए जाए इसकी आज़ादी।
बच्चियों को अगर उनके देह के अधिकार पर जागरुक कराया जाए ताकि किसी प्रकार के शोषण से बची रहे, उनसे घर पर खाने पीने, शिक्षा और स्वास्थ्य में भेदभाव न हो, उनको आगे पढ़ने और बढ़ने का मौक़ा मिले, उन्हें उनके क़ानूनी और समाजिक हक़ और ज़िम्मेदारियों की जानकारी हो ताकि उनकी चेतना का स्तर बढ़े। लड़कों पर भी काम करने की ज़रूरत है ताकि वो संवेदनशील बने। मर्द औरतों को ले कर स्टीरिओटाइप को ख़त्म किया जाए। ये सब होगा तो संस्कृति में बदलाव स्वत: होने लगेगा। शादी के संस्थान पर सवाल होंगे क्योंकि कितना भी चेतना का स्तर हो पुरुष के आधिपत्य को ज़िंदा रखने के लिए ये संस्थान चल रहा है!
हाँ फिर कौन ब्रा पहनती या नही पहनती है इसपर सवाल बेमानी हो जाएगा।
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