विद्रोह का प्रेम

ये बेगमपुरा की चाह ही 

विद्रोह करवाती है।

नही तो इस बढ़ती खाई में 

तो सब भस्म हो जाना है।

डर और असुरक्षा की भावना में 

अमीर अपने दौलत के लुट जाने से 

द्विज अपने विशेषाधिकार के छिन जाने से

बड़े अपने प्राधिकार कम हो जाने से

पुरुष कुंठित है अपनी हवस पर अंकुश से

जो शोषित है उसका विद्रोह हक़ का है

वो हक़ जो कही और गिरवी रखा है

वो लाला बड़ा पेटू है जो हक़ का व्यापार करता है

पेट पर छेद किये बग़ैर उसकी हवा नही निकाली जा सकती...!


कई दिनों से एक कुलबुलाहट है

एक विद्रोह की कविता लिखनी है

पर मेरे शब्दों में आक्रोश नही होता

मेरे भावों में ही ग़ुस्सा गायब है

मैं प्रेम जानती हूँ 

प्रेम को ही विद्रोह मानती हूँ 

पर क्या विद्रोह प्रेम के लिए नही होता?

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