एम्पैथी
एक दिन मैं सुबह उठा तो अजीब सा लग रहा था। जैसे मेरे शरीर और आत्मा में कुछ मिसफ़िट है। चलों कभी कभी होता है सोच कर मैं अनमने से मन से बिस्तर से बाहर निकला। बिस्तर घरी करने के लिए जैसे ही चादर उठाया तो याद आया अरे ये क्या, ये तो छोटू की काम है। पर छोटू सुबह आ कर वही तो मुझे जगाता है और मैं उसे दो चार गालीयाँ देता हूँ। आज कहा मर गया नाशपीटा!
"अरे कुत्ते के पिल्ले, रात फिर तूने घर से निकलने की जुर्रत की! आ घर वापस न तेरे हाथ पैर तोड़े तो!"
लगता उसने मेरी आवाज़ नही सुनी, बिस्तर वैसे ही छोड़ मै बालकनी के पास गया जहा छोटू अपना बिस्तर लगाता है। वहा सब सँभला हुआ था। अरे ये मेरा घर नही हो सकता। सब कुछ ज्यादा ही तरकीब से रखा था। छोटू है तो यादव पर मेरे साथ बचपन से रह कर एक्सपर्ट हो गया है।
अचानक मुझे टायलेट की तरफ प्रस्थान करते हुए मैं अपने जनेऊ को टटोलने लगा। हे राम, लगता रात सुंदरी ने फिर तोड़ दिया। सुंदरी वो बग़ल वालो की बाई। उसी के चलते मेरे एकाकी जीवन में कुछ रस है। नीच जात की है तो क्या, बिस्तर में तो ये ही ज्यादा मज़ा देती है। कितनी बिंदास है तीन बच्चो के माँ होते हुए भी। किसी कोठे में जाने से तो बेहतर है, रोज़ के सौ रुपए ही तो जाते है!
टायलेट से निकल कर हाथ धो कर निकला तो सोचा बिस्तर में जनेऊ ढूँढ कर, न टूटा हो तो नहाने के बाद दोबारा पहन लूँगा। क्या दोबारा बनाने की झंझट करना।
खैर उसे ढूँढने के चक्कर में बिस्तर तो सँभल गया पर वो नही मिला। अलमारी से कपड़े निकाले और मै नहाने निकल गया। आज फिर मंदिर जाना पड़ेगा और पूरी पूजा करनी पड़ेगी। घर में तो बस चंदन का तिलक लगा लो जब मान लेते है की संध्या की है!
खैर रेडी हो कर खुद को शीशे में देखते हुए लगा जैसे मेरी त्वचा थोड़ी टैन हो गई है। पर अच्छी बात ये थी की फ़ैट की जगह मुझे खुद में मसल ज्यादा महसूस हो रही थी। अचानक मै दीवार से सट कर कुछ स्ट्रेच किये और लगे हाथ २० पुश अप। हे राम मैं कबसे ये करने लगा!
उफ़्फ़ अब बिना छोटू के नाश्ता भी करना होगा। अजीब बात थी की की मेरे हाथ वो कर रहे थे जो आज तक मैने नही किया। मैने फ़ेवरिट टोस्ट और ऑमलेट तैयार किया और अपनी पसंद की कड़क चाय। बस अम्मा को न पता चले की मै शहर में आ कर अंडा खाने लगा हूँ।
घड़ी देखी तो कार की चाभी ढूँढने लगा। पर वो ग़ायब थी। हे राम अब समय तो बचा नही की ढूँढी जाए, चलो पब्लिक ट्रांसपोर्ट से काम चलाते है।
ये सोच मैं पैदल मेट्रो स्टेशन के लिए चल दिया। ये मेरे पैर ही जैसे मुझसे बग़ावत कर चुके थे। बड़े तेज़ी से आगे बढ़े जा रहे थे। ये सब जनेऊ न पहनने का नतीजा लगता है। उपनयन से ले कर आज तक एक पल के लिए भी कहा अलग किया है।
सड़क पर सबेरे ज्यादातर ड्राइवर, बाई और डेली वर्कर ही दिखते है। ग़लती से छू गया तो अलग बोझ! किसी तरह बचते बचाते टिकट की लाइन में लगा। आज तो धर्म भ्रष्ट हो गया। न जाने कितने भंगी चमार इस लाइन में होंगे! खैर जैसे तैसे ट्रेन पर पहुँचा तो कोई सीट ख़ाली नही थी तो याद आया, हे राम आज तो न पूजा की न तिलक लगाया। वो ही लगा लेता तो लोग थोड़ी इज़्ज़त देते और सीट मिल जाती।
चलो कोई नही। किसी तरह ऑफ़िस पहुँचे। मैं कुछ ही लोगो से हाथ मिलाता हूँ पर आज पता नही क्यूँ हाथ हर किसी के लिए बढ़ जी रहे है। आज कुछ तो गड़बड़ है।
शुक्ला जी, मेरे बॉस थोड़ा आराम से आते है पर आज तो मुझे उनके साथ ज्यादा समय बिताना है। अरे पूरी ऑफ़िस की पॉलिटिक्स की मै ही तो खबर देता हूँ।
उनको अपने केबिन में जाता देख मै उनकी तरफ लपका।
"मुझसे कुछ काम है। मुझे भी ही तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है। मै तुम्हारे काम से बिलकुल खुश नही हूँ। कल मिलना!"
उफ़्फ़!! ये क्या हुआ! कल और आज में तो मेरी दुनिया ही पलट गई!!
(आगे जारी रहेगा....)
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