सारा जहाँ हमारा
मै कृष्णा ठाकुर। हम घुम्मकडू जाति से है। पेशे से नाई।
अब मै साठ साल की हूँ। घर से निकले चार महिने हो गए। गन्ना कटाई के लिए पास के गाँव वालो के साथ खेत मज़दूरी के लिए निकली थी।
एक दिन पास के गाँव में नाराज़गी में मालिक ने इतना पीटा की, की मुझे होश मुंबई में रेलवे के अस्पताल मे आया।
गाँव घर। हमारा गाँव घर नही होता। हम टोली में रहते है। चार महिने पहले किस गाँव मे थे पता है। अब नही पता कहा होंगे।
परिवार! कोई अपना नही अब। पति छोड़े समय हो गया। दोनो बेटे उसके पास ही काम करते है। बेटी अपने ससुराल। जेठ जेठानी के पास बस मेरा कुछ सामान पड़ा है। बाकि तो ख़ुद कमा खा रहे है बहुत सालों से।
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