हाशिए पर समुदाय
रामदुलारी को शादी हुए २५ साल हो गए है। अपने पति और बूढ़ी सास के साथ यमुना के किनारे गाँव में रहती है। उसके कोई बच्चे नही है। गाँव में ३०% मुसलमान ३०% जाटव और ४०% धीवर है। इसका परिवार धीवर समुदाय से है। धीवर विमुक्त जनजाति में आते है पर यूपी में इनके लिए कोई सुविधा नही है!
धीवर मल्लाहों की सह जाति है। अंग्रेज़ों के रेल आने से पहले पानी से यातायात सबसे ज़्यादा आम था और इनका बसर उसी से होता था। रेल आने पर इनका काम कम होता गया। पर इनके गाँव आज भी सड़क से नही जुड़े है और न ही कोई यातायात है। ये कारोबार कम हुआ तो ये लोग चोरी डकैती और बालू खनन में जुट गए। बुग्गी भर भर के शहरों के विकास में इनका योगदान रहा। सरकार ने इनका बालू खनन बंद करवा कर ठेकेदारों को दे दिया जो मशीनों से टनों बालू खनन करने लगे। यमुना नदी से जुड़े और व्यवसाय जैसे मछली, खेती भी ख़त्म होती गई। फिर एक नया काम शुरु हुआ दारू तस्करी का। हरियाणा में दारू यूपी से सस्ती है और देसी दारू बहुत बनती है। नदी पार कर ढेरों दारू यमुना से जुड़े हर गाँव के हर घर में आती है। लगभग हर पुरुष और बच्चे इसकी गिरफ़्त में है। गाँव के प्रधान ख़ुद बेचते है। सड़क इतनी ख़राब है की कोई पुलिस या एक्साइज वाला नही आता है। आता भी होगा तो पैसे खा कर चुप है।
रामदुलारी का पति महिने में आधे दिन दारू पीता है बाक़ी दिन मज़दूरी करता है दूसरों के खेत में। वो भी ख़ुद मज़दूरी करके काम चलाती है।
एक गाँव वाला कहता है, "ये तो उसके लिए रोटी बनाती है सारे उसके काम करती है और वो दारू पी कर इसकी रोज़ पिटाई करता है। बेचारी के बच्चे भी नही है की मन बहला ले।"
दूसरा जोड़ता है, "शुरु से पीटता है पर अब कुछ ज़्यादा करने लगा है।"
बूढ़ी सास भी लँगड़ाती हुई आई और कहने लगी, "बेचारी की गत कर रखी है, मैं उसकी ख़बर लेती हूँ, पड़ा हुआ है चौक पर।"
सहयोगिनी ने कहा, "दारू पिये को कहने का कोई फ़ायदा नही। इसे महिने भर महिला सशक्तिकरण केंद्र भेज तो रोटी नही मिलेगी तो अक़्ल ठिकाने आएगी!"
मैंने पूछा, "रोटी क्यों बना कर खिलाती हो?"
वो बोली, "तो क्या करें! ये तो धर्म है औरत का।"
मैंने आगे नही कहा तो क्या पिटना भी धर्म है! इसकी तो काउंसिलिंग कर कुछ हल निकाला जा सकता है पर शराब की तस्करी कैसे रोकी जाए, उससे दूसरा रोज़गार कौन मुहय्या कराएगा। न जाने कितनी और रामदुलारी को सामने आना बाक़ी है! अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद और बाज़ारीकरण से सबसे ज़्यादा पीड़ित समाज का दर्द कौन समझ पा रहा है??
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