संदेश

जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हाईरैरकी

किसी जगह, व्यक्ति, चीज को महिमामंडित करने से बाक़ियों की क़ीमत कम नहीं हो जाती। अजीब सनक है हम लोगों में हर चीज को हाइरैरकी में रखने की। ये भयंकर बीमारी है! शायद हम में ये समझने का कभी विवेक पैदा होगा। सम्मान से रुतबा भला सत्ता का है देखो खेल  हाइरेरकी बनाम हमारी छद्म लोकशाही - घर में, दफ़्तरों में, समाज में, राजनीति में, सरकार में.. और तो और समानता और नारीवाद सोच पर काम करने वाले समाजिक संस्थान में भी! सब खडे़ है इस सीढ़ी पर अपनी जगह सुनिश्चित करने में जो ऊपर है तो नीचे वाले को और नीचे कर ख़ुद को और ऊपर चढ़ा रहा है ब्राह्मण कहे दलित से तुम नीच हो मेरा सम्मान करो  बूढ़ा कहे जवान से तुम नए घोड़े हो मेरा आदर करो  जवान कहे बच्चे से तुम कच्चे हो मेरा कहना मानो अमीर कहे गरीब से तुम दरिद्र हो मेरी ग़ुलामी करो  मालिक कहे नौकर से तुम गधे हो बोझा ढ़ो अफ़सर कहे नीचे के कर्मचारी से तुम हुकुम बजाओ  पुरुष कहे महिला से तुम पैर की जूती हो वही रहो शिक्षित कहे अनपढ़ से ढोल हो समझ नही पाओगे  बुद्धिजीवी कहे औसत दर्जे हो तुम्हारे लिए कोई मंच नही है समाजिक कार्यकर्ता कहे क्लाइं...

कंक्रीट के जंगल

मेरे टेरेस के साथी! वो सफ़ेद और काले कबूतर की जोड़ी वो नारंगी आँखों वाला पड़ोसी का बिल्ला वो कौवों की काय काय और कंक्रीट के जंगलों में उगता सूरज सब बिलकुल घड़ी देख कर तय समय पर होता है प्रकृति जैसे इस इंसानी आक्रमण से भी बेपरवाह है आखिर कब तक?  जब तक मैं पूरी चेतना से इनका हिस्सा बन अपना तुलसी नींबू का काढ़ा पीती हूँ  जब तक मैं अपने पैर ज़रूरत का पसारती हूँ  जब तक मैं ठहर कर अपनी सासों को सुन सकती हूँ बस तब तक! आज शाम को गाड़ी चलाते हुए सैकड़ों निर्माणरत गगनचुंबी इमारतों के बीच ढलता सूरज, धूल और प्रदूषण की वजह से बहुत ही नीरस लग रहा था। न जाने हम कितनी हरियाली को रौंद कर कंकरीट के जंगल खड़े कर रहे है। एक आदमी को क्या चाहिए, एक छोटा सा घरौंदा। इतने बडे बडे घरों का क्या औचित्य है?  सिर्फ बर्बादी!!!

हिंसा का चक्र

सहारनपुर के मेरे चार महिने के गहन फिल्ड वर्क और आठ महिने की काउसलिंग के आधार पर जो देखा, सुना और महसूस किया, उस आधार पर कह सकती हूँ कि औरत अभी जगी नही है और उनके साथ जुर्म बढ़ते जा रहे है। जन्म से पहले से ज़िंदा रहने से शुरु हुआ संघर्ष उसकी हत्या, आत्महत्या या बीमारी से मौत से भी नही ख़त्म होता। गर्भवती महिला को हॉस्पिटल न जाने देना, दवाई खा कर गर्भपात, किसी भी प्रकार के परिवार नियोजन का उपयोग न करना, लड़के के लिए आशा-डॉक्टर द्वारा सातवें महिने तक गर्भपात, छोटी सी रसौली होने पर डॉक्टर द्वारा बच्चेदानी निकलवाना। पिता द्वारा बच्चियों का लैंगिक शोषण, बच्चियों को माँ से ज़बरन दूर कर प्रधान/एनजीओ द्वारा कही और भेज देना। बाल कल्याण समिति को बाइपास कर बच्चियों को स्थानीय ऐजेंसी को देना! स्कूलों में लडकी-लड़कों को अलग कर देना, अलग ग्राउंड, क्लास में रखना, बात करने पर धमकाना मारना पीटना, साथ-साथ में कोई भी गतिविधि नही करवाना! किशोरियों की पढ़ाई रोक देना, बाहर नही जाने देना, बाल मज़दूरी करवाना, ज़बरन बाल विवाह, प्रेम संबंध के बारे में पता चलने पर लडकी को धमकाना, मारना-पीटना; समलैंगिक किशोरियों क...

विमुक्त जाति

७ सितम्बर को उमाजी नाईक के २६६ वा जन्मदिन पर TISS में ६६ वा विमुक्त दिवस बनाया गया। अब जितना मैने कहा उसमें बहुत से नाम/ शब्द आप पहली बार सुन रहे होगे! पहला नाम उमाजी नाईक से शुरु होते है। ये कौन? न तो किसी इतिहास के किताब में है और न ही इनकी किसी भी जयंती ता ज़िक्र सुना! ये अंग्रेज़ों के ख़िलाफ लड़ने वाले पहले स्वतंत्रता सेनानी थे! ये रामोशी जाति के थे!  है न विडम्बना की हमारा इतिहास मूल नायकों को दबाए हुए है! अब आते है विमुक्त दिवस पर। ये क्या है? कोई तो नही बनाता, है न? अंग्रेज़ों को सबसे ज्यादा लोहा देनी वाली जातियाँ जैसे रामोशी पार्धी लोध को एक कानून के तहत अंग्रेज़ों ने जन्म से अपराधी घोषित कर दिया था।और पूरे देश में ऐसे सेटलमेंट बनाए (नाज़ी कंसेनट्रेशन कैंप की तरह) जहा औरतें बच्चे बूढ़े सब को घेरा लगा कर बंद कर दिया था। वहा दिन में चार बार सबको हाजरी देनी होती थी की लाट साहेब आज हमने कोई ठगी नही की! ये दुनिया का पहला जेल था जहा पैदा होते ही बच्चे को अपराधी का टैग माथे पर लग जाता था! अंग्रेज़ सरकार ने यहा तक ये भी प्लान बना लिया था देशभर की सारी अपराधी जाति को जहाज़ में पहुँच...

असभ्य सभ्य की जमात

रात इतनी भी गहराई नहीं है पर ये बयार थम क्यों गई है जैसे सबकी सासें ही रुक गई है इस शहर में जल रहे बल्ब भी बेजान है क्योंकि जुगनू कही खो गए है ख़ामोशी काटने को आ रही है कुछ सुनने की तड़प गहरा गई है पर झिंगुर शायद मातम बना रहे है  दुनिया में बहुत कुछ मर चुका है बहुत से पेड़ कट गए बाक़ी गर्मी में झुलस गए इंसानियत नहीं बची है आत्मा बिक चुकी है इस मुर्दा शहर में भला कौन रहता है एक भौंकता कुत्ता कुछ चंद टिटहरी  और ढ़ेर सारी भटकती रूहें  जिन्हें न इस जहाँ में सुकून था न उस जहाँ में..! और ज़िंदा लोगों ने मुर्दों को दे दी है शमशीर  जिससे ये बनाएँगे क़ब्रगाह  इनकी प्यासी रूहें ख़ून चूसती है झूठ मक्कारी और भ्रष्टाचार से पिंजड़े में बैठ ये आज़ादी की बात करते है गबन कर औरों की हक़ की बात करते है ये असभ्य सभ्य, ज़ाहिल शिक्षित की जमात है बस अजीब विडंबना ये है  सब ज़िंदगी के दूर भाग रहे है और उसे तरक़्क़ी का नाम दे रहे है!

ज़ेवर

औरतें कपड़े-लत्ते, जेवर, मेकअप के लिए जितना ललायित होती है काश उतना की अपने हक़ों के लिए भी होती!! वैसे इनका लालच ही तो दिखा कर सभ्य समाज का पुरुष औरत को अपनी हवस का शिकार बनाता रहा है। इसी की चाह में पत्नियाँ पति की गुलाम बनी रहती है। ऊँची वर्ग वाले पुरुष भी इसी लालच को दिखा गरीब औरतों का फ़ायदा उठाते थे। और जब औरतों की ख़ुशी इन सब से जोड़ दी जाएगी तो वो देह की ख़ुशी से भी बिलकुल अंजान रहेगी। आर्थिक रूप से स्वभिमंबी औरतें भी बाक़ी सब छोड़ अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं ताम-झाम में लगा देती है। बाक़ी बुनियादी ज़रूरतों के लिए पुरुष पर निर्भर बनी रहती है! इनके दुष्चक्र से निकलना औरतों के लिए बहुत ज़रूरी है! सुंदरता का  कांसेप्ट ही बचपन से इस तरह दिमाग में घुसेड़ दिया जाता क्या करे ?  सुन्दर क्लिप वाली लड़की सुन्दर  लाली वाली पर लड़के लट्टू  माँ बाप ही लड़कियों की तरह रहने को कहते  At the end they want this love and attention which they can't find for themselves as a woman महिलाओं के स्थानीय गाने सुन कर उनका आंकलन कर रही थी। सब के सब गाने इन्हीं पर होते है। दलित म...