वही छपता है जो बिकता है!
अकसर समाजिक क्षेत्र में काम करने वाले अपने काम के बारे में या तो पोर्टल से या न्यूज़ के माध्यम से या अकादमिक पेपरों के माध्यम से ही पेश करते है। ये काम के प्रति प्रोफेशनिज़म की तरह पेश किया जाता है। आम लोगों से चर्चा या शोशल मीडिया पर चर्चा बहुत बाज़ारू समझा जाता है। ये औरों से अलग रहने की चाह अपने में एक ज़बरदस्त पावर डायनेमिक्स है जो कभी आपको लोगों से नही जोड़ सकता। लोगों के बीच रहना उनके रहन सहन को देखना उनका ही हिस्सा बन कर चीज़ों को देखना आपको बहुत विनम्र बनाता है। इसका मतलब ये बिलकुल नही आप उनके सिर्फ दर्द या शोषण को पेश करो। न उनके मिथकों और महान पुरुषों की कहानियाँ सुनाओ। रोज़मर्रा में उनकी ज़िन्दगी में बहुत कुछ ऐसा है जिसे समझने की जरूरत है। समय के साथ समाज में बदलाव ज़रूरी है नही तो समाज में सड़ांद आने लगती है। बदलाव तभी संभव है जब लोग सशक्त होगे। ये सब बिना गहराई में गोता लगाए संभव नही। हम बैंड-एड सॉल्यूशन लगा कर काम चलाने में विश्वास रखते है। जड़ से बुराई को मिटाना नही तो संभव नही हो पाता।
अब सोचो कितने होते होंगे जो कोई भी न्यूज़ पेपर पढ़ते होगे। फिर कितने किताबें पढ़ते है। फिर कितने अकादमिक पेपर पढ़ते है! फिर सोचो कितने अच्छे और सच्चे आर्टिकल या पेपर छपते है जो चंद लोगों तक पहुँचते है। ये सब एक तरफ़ा रिपोर्टिंग है। इसमें आप लोगों से सीधे चर्चा नही करते है। चर्चा में लोग क्या समझ रहे है यही नही क्या नही समझ पा रहे है ये भी ज़रूरी पहलू है!
हमारी एक बहुत बड़ी बीमारी है पर हर चीज़ को लीप पोत पर पेश करने में विश्वास रखते है। एक हद तक तो जो कहा गया, क्या सुना और कितना नोट हुआ से ले कर क्या लिखा गया तक बहुत कुछ खो चुकी होता है। हर जगह रिस्क देख कर लिखा जाने लगा तो लोग वही कहेंगे जो पावरफुल करना चाह रहे है!
एक किताब में एक कहानी छपी
नाम रखा 'सच्चाई'
दिल्ली के एक एसी हॉल में सार्थक चर्चा हुई
बुक फ़ेयर में 'मैं तेरी खुजाऊँ तू मेरी खुजाए' यार ने विमोचन किया
क्रिटिकल रिव्यू आए..
'ज़मीन के सच को छू गई... बिलकुल ताज़ा हवा के झोंके सी'
'सच कहना तो इनसे सीखे... क्या सभ्य भाषा क्या शैली..'
पब्लिशर्स का पैसा वसूल हुआ
कौन ज़ी रहा है देखने के लिए की 'सच्चाई' कालजयी होगी
सच को ढाँप के रखो उनके लिए जो वो सच को जी रहे है...
उन तक न ही पहुँचे!
क्योंकि उन तक पहुँच गई तो
'सच्चाई' जमीन पर लोट मार लेगी...!
ये उनकी सच्चाई नही है; उनकी है और उनके लिए है -
जो ग़रीबी के पैसे बनाते है!
जो आँसुओं से जाम भर कर ठहाके मारते है!
उनकी दुनिया में जो लिखा जाता है वही खप जाता है...
बस 'सच्चाई' जैसे एलियन की जगह ख़ुद के अंदर झाँकते
तो शायद वहा दबी कुचली 'सच्चाई' कराहती हुई मिल तो जाती!
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