हमारी अम्मी ज़रूर आएगी!
तलहेडी बस स्टॉप पर पहुँचे तो भूख लग गई थी। फल वाले भइया से केले के दाम पूछते हुए नीचे रोड के बैठे पाँच बच्चों पर ध्यान गया। सबसे बड़ी लग रही लड़की से मैंने पूछा,
"यहा क्यों बैठे हो बच्चों?"
"हमारी अम्मी का इंतज़ार कर रहे है।"
"अगली बस से आ रही है क्या?"
"नही जी। वो तो हम तीन दिन से यहा आ रहे है। अम्मी देवबंध में काम करती है। यहा तलहेडी में कमरा ले रखा है।"
"कहा से आ रहे हो? पापा कहा है तुम्हारे?"
"हमारा घर तो नांगल में है। जुड़ा वाले मस्जिद के पास। अम्मी पापा का झगड़ा हो गया है। अलग अलग कमरे है उनके।"
"तुम किसके पास रहते हो?"
"हम पहले तो अम्मी के पास रहते थे। फिर १० दिन पहले पापा के पास चले गए। पापा तीन दिन पहले पहाड़ चले गए, हमें अकेला छोड कर। ख़र्च के लिए कुछ नही है तो हम मम्मी को ढूँढने आए है। नांगल से तीन दिन से पैदल आ रहे है। शाम को वापस चले जाते है। आज दस बचे तक रुकेंगे।"
"10-12 किलोमीटर पैदल आते हो? तुम्हारे नाम और उम्र कितनी है?"
"हाँ रोज़ आ रहे है। ये मेरे से बड़ी है निशा, मैं नेहा, ये मरियम, ये भाई रिशू और ये छोटी शीबा। मैं आठ साल की हूँ और ये छोटी ढाई साल की।"
"अम्मी अब्बा का नाम?"
"अम्मी का नर्गिस और अब्बा का राशिद।"
पूरी बातचीत नेहा कर रही थी। दूसरे नम्बर की। सबको वही संभाले थी। बड़ी को सुनता कम था तो जवाब भी नही दे रही थी। तीनों बड़ी लड़कियों ने हिजाब पहना था। तीसरे वाला तो हाफ पैंट पहनी थी पर हिजाब अपनी जगह था। ढाई साल की दीबा तो हाईवे पर दौड़ जाती तो नौ साल की निशा वापस लाती।
"किसी को जानते हो यहा?"
"हाँ दूर के चाचा की बर्तन की दुकान है पीछे।"
"तो उनके पास क्यों नही बैठते।"
"आज हमारी मम्मी ज़रूर आएगी। बस से उतरेगी तो दिख जाएगी। चाचा के पास गए तो उन्होंने भगा दिया।"
मैं 1098 चाइलड लाइन मिलाते हुए चाचा की दुकान की तरफ़ गई। पूरे डीटेल देने पर ऑपरेटर बोली की वो जल्द टीम को भिजवाती है।
चाचा के पास गए तो चाचा तो अजीब ही रट लगाए थे।
"हमें कोई मतलब नही इनसे। इनकी माँ तो धंधा करती है। बाप भी ग़ैरज़िम्मेदार है।"
इतमें में सहारनपुर सें चाइलड लाइन का कॉल आया और उन्होंने पूरी जानकारी फिर ली। वो बोली की सहारनपुर पुलिस टीम को भेज रहे है। बच्चों की हालत देख मैंने फल वाले से छह केले देने को कहा। उसने पूरे दर्जन दे कर कहा खिला दीजिए!
कुछ देर में पुलिस कंट्रोल रूम से कॉल आया।
"मैडम आपने बताया वो तलहेडी के बच्चों के बारे में?"
"हाँ जी बच्चे यही है पर मुझे निकलना है बहुत देर हो गई है। बच्चे कही नही जाएँगे, आप टीम भेज दो। मैंने फल वाले भैया को भी कह दिया है।"
"आप ही क्यों नही ले कर थाने आ जाती।"
"अरे ये तो आपका काम है। मेरे पास कोई साधन नही है और पाँच को तो बस में बैठा कर लाना भी मुशलिक है। और ये जिद्द लगाये है की मम्मी ज़रूर आएगी। हम यहा से रात १० बजे से पहले कही नही जाएँगे।"
"अरे मैडम हमारे पास एक अकेला यही काम थोड़े है। गाड़ी अफ़सर ने कही और लगा रखी है।"
"हाँ नेता अफ़सर के काम ज़्यादा ज़रूरी है इस सड़क पर बैठे बच्चों से। कुछ ग़लत हो गया तो देख लेना।"
"अरे मैडम देखिए सहारनपुर से तलहेडी एक घंटा लगेगा।"
"अरे आपने चौकी वाले नही आ सकते क्या? फल वाला मनोज भैया बता कहा की एक-डेढ किमी की दूरी पर है चौकी। और हाँ वो बच्चों के चाचा की जो दुकान है वहाँ भी पूछ लेना। वैसे वो चाचा बच्चों की माँ को धंधे वाली बता रहा था।"
"अरे मैडम देखते है। फिर तो हराम के बच्चे होगें।"
मेरा ख़ून खौल गया।
"क्या बोल गए! ज़बान संभाल कर बात करों। वो सिर्फ़ बच्चे है। तुम अपना काम करो!!"
बस में बैठने के दस मिनट में लोकल थाने से कॉल आया। "मैडम किस तरफ़ है। फल की दुकान के पास? हाँ हाँ दिख गए!"
फिर एक घंटे के बाद उसी पुलिस वाले का कॉल आया।
"मैडम बच्चों को घर पहुँचा दिया नांगल। मकान मालिक मिल गया। किराये का मकान है दोनों का।बाप को कॉल किया है बात नही हुई है। दिखे है कॉल आ गया उसका।"
फिर दूसरे में बात करके बाप को डाँट रहा था।
"अरे क्यों औरत से झगड़ा कर के भगा दिया और बच्चों को छोड कर चला गया। ये बच्चे रोज़ बीस किमी चल रहे है। कैसा बाप है।"
"मैडम ठीक है बात हो गई।"
"अरे तलहेडी में माँ का भी पता करो। मिले तो बताओ की बच्चों की हालत और कैसे बाप अकेला छोड गया।"
दूसरा पुलिस वाला बेहतर था!u
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