सामाजिक सुरक्षा

राज्य और केंद्र सरकार तमाम स्कीम चला रही है। बहुत सी स्कीम काफ़ी अच्छी है। 
प्रचार प्रसार भी बहुत हो रहा है! ग़रीब को मकान बनाने के लिए आवास योजना, हर घर में शौचालय बनाने के लिए स्वच्छ भारत, हर ब्लॉक में शिक्षा के लिए १०-१५ अंग्रेज़ी मीडियम के सरकारी स्कूल, एक आदर्श विध्यालय, एक लड़कियों के लिए कस्तूरबा, लड़कियों/ लड़कों के हॉस्टल, स्वास्थ्य बीमा योजना, गाँव में एएनएम और आशा जो गर्भवती, प्रसूती और बच्चों को सभी स्वास्थ्य सुविधा - वज़न, टीका, आईरन-कैलशियन, पोषण मुहय्या करना, किशोरी के लिए पोषण, (यूपी में नैपकिन नही है), कृषि के लिए सस्ते दर पर बीच, खाद और कीटनाशक, कृषि समस्या का निदान, विधवा को मुफ़्त इलाज और पेंशन, लगभग हर पाँच किमी में एक सीएससी जो हर सुविधा ऑनलाइन करवाता है, रोज़गार से जुड़ी ढेरों ट्रेनिंग और स्कीम, एमडीएम कूक को सीधे मानयेद...
पर आम गाँव का नागरिक ख़ासकर महिलाएँ इनके बारे में बिलकुल अनभिज्ञ है। बताए जाने पर भी इतने सालों से बिना सुविधा के रहने के इतने आदी हो गए है कि वो आसानी से समझ भी नही पाती। सरकार पर अविश्वास इतना ज़्यादा है कि फ़्री के काम में भी सोचते है बहुत पैसे लगेंगे और ये सब ग़रीब के लिए नही है। करप्शन न होने पर भी उसकी आशंका लोगों को निष्क्रिय कर देती है। सूचना का अधिकार होने की भी पढ़े लिखों को इसकी जानकारी नही है। जो भी गाँवों में काम कर रहे कार्यकर्ता है उन्हें भी हर स्कीम की जानकारी नही है। गाँव के प्रधान या अख़बार मीडिया भी सरल भाषा में नागरिकों को जानकारी नही देता।
पढ़े लिखो से गुज़ारिश है की सारी जानकारी लें और अपने आसपास के ज़रूरतमंदों को पूरी जानकारी दें!

मनीषा सिंह लिखती हैं


माँ बच्चों को क्रेच में छोड़ती है ! जालिम औरत ,बच्चे रखे जाते आजकल की माओं से!


बच्चे होस्टल में पढ़ रहे हैं ! कैसे छोड़ देते हैं?


तीन महीने के बच्चे को सास के हवाले कर नौकरी पर चली गई ,टिच-टिच-टिच!


हमारी मम्मी गर्म-गर्म रोटी सेंकती थी जब जो खाए तब! मेरी भाभी से खाना ही बनता कुक आती है!


सास-ससुर को छोड़ के दोनों अब्रॉड सेटल हो गए हैं! बेचारे माँ -बाप अकेले रह गए!


और भी कई जुमले बताते हैं कि हम सहजता से कोसों दूर हैं

हर बात में औलाद और उससे भी ज़्यादा बहु नाम के प्राणी को कोसकर हम सारे पाप धो लेते हैं!

उपरोक्त परिस्तिथियां अभिशाप टाइप कुछ नहीं है! फेज़ हैं बस ज़िन्दगी के!

स्कूल बेहतर बनें, होस्टल सुलभ और सुरक्षित हों! वृद्धाश्रम ,शेल्टर होम व्यवस्थित हों ! माँ का सहयोग सारी फैमली करे! बच्चे पैदा करने से लेकर उनको बड़ा करने तक कि ज़िम्मेदारी माँ की ही क्यों हो?

बड़े लोग अपेक्षाओं से लबरेज़ तो रहते हैं परंतु ज़िम्मेदारी के नाम पर मुकर जाते हैं अक़्सर! "हम बूढ़े हो गए हैं!" ,"हमने भी तुमको बड़ा किया है!" ,"तुम्हारे बच्चे तुम जानो!","हम तुम्हारे शहर में एडजस्ट नहीं हो सकते !"

ये सब कहते हुए हम भूल जाते हैं कि ताउम्र आप इस समाज की इकाई हैं! जो उपयोगी नहीं रहेगा उस इकाई में उसे उपेक्षा सहनी पड़ेगी ! जो नहीं बदलेगा समय के साथ ख़ारिज हो जाएगा स्वतः ही

होस्टल,वृद्धाश्रम, शेल्टर होम कोई गन्दी जगहें नहीं हैं

थोड़ा सा समझ का फेर है!

एक दूसरे को गालियां देकर ,अपना गुस्सा बच्चो पर निकल कर,उपेक्षित जीकर, अवसाद में रहकर,अपनी महत्वाकांक्षाओं को त्याग कर जीने से बेहतर है ,सोच में सुधार हो! सुविधाओं का सदुपयोग करना ! हम सब एकदूसरे की जरूरत हैं!

एकल परिवार भी समाज का हिस्सा हैं!

हम सबको पल्ला झाड़ने की आदत से बाज़ आना होगा! वृद्ध, बच्चे,स्त्रियां एक ही परिवार की नहीं अपितु पूरे समाज का हिस्सा हैं! यदि हम अपना कर्तव्य अच्छे से निभाएं,अपनी भूमिका समझें तो कोई कहीं भी अनसेफ नहीं है!

इसे स्टेट पैटरनलिजम कहते है! हर किसी को सक्षम बनाने का प्रयास होना चाहिए फिर वो चाहे बच्चा हो अपाहिज हो या वृद्ध। औरत तो किसी भी तरह पुरुष से कमतर नही है। इस पितृसत्तातमक सोच का असर है की पूरी तरह सक्षम औरत भी ज़बरदस्ती शेलटर में बंद रखी जाती है जबकि वो बाहर रह कर अपना गुज़र कर सकती है। हमें स्टेट गार्डियनशिप को कम से कम करना होगा और समुदाय को ये ज़िम्मेदारी लेनी होगी। पहले ऐसे की होता था। स्टेट को मज़बूत बनाना अपने में बहुत ख़तरनाक है।

फेमिनिजम न ही व्यक्तिवाद तो सही मानती है और न ही स्टेट पैटरनलिजम को। समुदाय सबसे ज़रूरी इकाई है जिसे मज़बूत करने की ज़रूरत है!

ये ग़रीबों के लिस्ट का लिंक है। पर सच्चाई यह है कि इसमें बहुत से जिनके नाम होने चाहिए उनके तो नही है पर उनके भी है जो किसी भी तरह से गरीब नही है!! 

#नकली_गरीब

http://mnregaweb2.nic.in/netnrega/secc_list.aspx



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