स्वास्थ्य सेवाएँ

जो पूँजीवाद में गोते लगा कर असमानता और शोषण की बात करते है और सरकार को कोसते है उनपर हँसी और दया सी आती है।
गाँवों में अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की भयंकर कमी है, आप मंहगे प्राइवेट हॉस्पीटल में नौकरी और प्राइवेट प्रैक्टिस छोड़ कर गाँवों में क्यों नही काम करते?
वैसे आज गाँवों में टीका-करण दिवस था। ए एन एम, आशा और आंगनवाड़ी को बुला बुला कर बच्चों, गर्भवती और किशोरी को टीके दवाई देता देख और गर्भवती और नई माँ को स्वास्थ्य जानकारी देने का बहुत अच्छा अनुभव रहा।
सहारनपुर आते ही डेंगू से रिकवर हो गए थे लगभग। एक गाँव में आशा बहू के घर बकरी थी। उनको बताया की डेंगू था तो तुरंत ग्लास ले कर गई हमारे सामने दूध निकाला और गरम करके एक कप पेश कर दिया। पहली बार पिया पर अच्छा लगा। बताने लगी की बिमारी में गाँव के लोग ले जाते है ख़ुद भी छोटी मोटी बिमारी में पी लेते है। गाय की तरह स्वाद नही होता पर दवाई की तरह पिया जा सकता है।
सबसे बेहतर होता है पर बहुत कम होने की वजह से कमर्शियल वैल्यू कम है।

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