धर्म का तड़का

यूपी राजस्थान हरियाणा हिमाचल जम्मू एमपी में जितने गाँवों में गई हूँ जाहर पीर या गोगा जी के माँड़े, बाबा बालकनाथ की मज़ार, बहुत से पीर फ़क़ीर को न ही किसी जाति से और न किसी हिंदू-मुस्लिम बायनरी में तय किए जा सकते है।
सावन का महिना ख़ास है क्योंकि गाँव ये कोई एक जात (यात्रा) पर गोगा मेडी / माँड़े या पास के मेडी पर जाता है और पूरा गाँव जब तक वो आता नही गाँव की माँड़ी पर जुलूस बना कर गाते हुए जाते है। आने पर पूरे गाँव को भंडारा खिलाया जाता है। ये पूरे गाँव को (हर जाति धर्म) एक समुदाय में बाँधता है। 
आज भी न जाने कितने ऊत्तर भारतीय गाँव नाथ परंपरा से जुड़े हुए है। अगर अनुमान लगाया जाए तो ९०% से ज़्यादा गाँव जिसमें सवर्ण जाति भी है नाथ परंपरा से जुड़े है। बाकि सब देवी देवता शहरों से शुरु हो कर गाँवों में आ गया है। नाथ परंपरा हर तरह के ऊँच नीच को निरस्त करती है। 
कब इसमें मिलावट आनी शुरु हुई ये गहन शोध का विषय है!

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