बीमार समाजिक संस्थान

जन संपर्क करना और लोगों के साथ काम करने के साथ कभी मात्रात्मक नियंत्रण नही किया जा करता है। पर जो भी ग़ैर सरकारी या सरकारी संस्थान कही से भी  फ़ंड लेती है वो मात्रात्मक मूल्यांकन ही करते या करवाते है। गुणवत्ता का मूल्याँकन करना है तो वो गुणात्मक आडिट द्वारा ही किया जा सकता है। 

चाहे किसी कॉर्पोरेट का सेल्स जॉब हो या किसी समाजिक संस्थान में ज़मीनी काम सिर्फ़ दो चीज़ें देखी जाती है - कहा / किससे संपर्क किया और वो पूर्ण रूप से संपन्न हुआ की नही। दोनों ऐसे है जिसका सच सिर्फ़ कार्यकर्ता और क्लाइंट के बीच रह जाता है। ही कार्यशैली पर ध्यान दिया जाता है और ही निवेश में जिसमें कार्यकर्ता की कार्यक्षमता और उसे कार्य कुशलता से करने के लिए उपयुक्त जानकारी और ज़रूरी सुविधाएँ मुहैया करवाई जाए। बदलाव हर कोई चाहता है इन सब के बावजूद ज़ोर सिर्फ़ योजनाबद्ध उद्देश्यों पर होता है। एक अजीब सी दूरी बना लेती है समीक्षा समिति हर ज़मीनी कार्यकर्ता से और बस उसपर फ़ोकस करते है जिससे उनकी नौकरी बनी रहे और कुछ ऐसी उपलब्धि हो जिससे उनकी वृत्तिक सत्यनिष्ठा का इज़ाफ़ा हो!

बदलाव होने से रहा जब तक हर कार्यकर्ता और उनके समीक्षक सब ज़मीन से पूरी जुनून से जुड़े हो!

तीन अमूल्य मूल्य जो हम सबमें हैं - करुणा, स्वाभाविक न्याय और आत्मसम्मान! बस इस दुनिया के थपेड़े इनको विकृत कर देते हैं। जरुरत हैं खुद में और औरों में इनको पहचानने की और जीवन के हर पहलु में इन्हे जगह देने की।

#कैसी_आजादी

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