शहरी गाँव

शहरी गाँव का सच: 
पिछले एक महिने में बहुत सी ग़रीब माँओं का दर्द सुना है। अपने बच्चों को अपने गोद में खोने की कहानी सुनी है। पैसे की कमी की वजह से दवाई रोक कर घर वापिस लाने की लाचारी सुनी है। 
शहरों में इंसानियत कही मर गई है और हर परिवार बहुत ही आईसोलेटड है! औरतों का स्वास्थ ख़राब रहता है और बच्चियाँ गुमसुम रहती है!
गंदगी, ऑपन सीवर, एक अंधेरे कमरे में ७-८ लोगो का परिवार! बस शहर में है की शायद बच्चे पढ़ जाए और ग़रीबी के चक्र से निकल जाए। पर माहौल ऐसा की बच्चो को बचाए रखना अपने में बहुत बड़ा संघर्ष है!
बहुत कुछ है लिखने को पर लिखा नही जा रहा। कभी विस्तार में लिखूँगी!
(फ़िल्म हिंदी मीडियम से बहुत दूर है सच)

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