स्कूल की घंटी बजी
"पुरूष नारी को उतनी ही शिक्षा देता है जितनी उसके स्वार्थ में बाधक न हो"
जयशंकर प्रसाद
Men provide women with only that much education that will not be a threat to his selfish interests! Equal education is often misconstrued to suit patriarchy!
अपने मूलनिवासी समाज की लड़कियों की आज की मौजूदा स्तिथि को जितना गहराई से जानने की कोशिश कर रही हूँ, उतना दोष हमारी ब्राह्मणी शिक्षा में दिख रहा हैं. ऐसे मूलनिवासी समाज जहां आज से कुछ पीढ़ी पहले तक औरत बराबर की हिस्सेदार थी, शिक्षा ने उल्टा भेदभाव बढ़ाया हैं. लडकियां जो पहले आज़ाद थी, आज अपने ही घरो में बंदी हैं.
शिक्षा का जुनून किसी भी उम्र में पैदा किया जा सकता है! सत्तर साल की कृष्णा को जब पहली बार लिखने का मौक़ा मिला है तो वो थमें नही थम रही थी...!
चलिये ले चलती हूँ आपको उदयपुर के एक छोटे से गाँव आर में। पहाड़ों के बीच एक ख़ूबसूरत सा गाँव। गाँव के बीचों बीच दो सरकारी स्कूल है। एक प्राइमरी और दूसरा सेकेण्डरी। सीनियर बच्चे पास के क़स्बे में पढने जाते है।
इस साल प्रधानाचार्य सुबोध मिश्रा की नियुक्ति प्राइमरी स्कूल में हुई है। गाँव वालो को पता चला की काफी पढे लिखे है। अब तो गाँव में शिक्षा की क्रांति आ जाएगी। छोटे बच्चो का भविष्य बन जाएगा।
बडूआ जो गाँव के पास ही भील टोले में रहता था, उदयपुर मे काम के लिए जाता है। वहा उसे पता चला की गाँव के सरकारी स्कूल मे पढ़ाई फ्री है। अपने भाई से छुट्टी मे बोल कर गया की इस साल दोनो बेटे विजय और विनय को स्कूल मे दाख़िल करा दे! छोटा भाई मडूआ स्कूल गया तो उससे नाम पूछा। कौन लोग हो? मडूआ बोला, "भील"!
"अच्छा। बच्चे को पढा कर क्यो अपनी संस्कृति ख़त्म करना चाहते हो। घर पर रहेंगे तो तुम्हारी तरह जंगल के काम सीखेंगे।"
वो वापस आ गया। पता चला पड़ोस के महुआ के बेटी को भी यही कह कर वापस भेज दिया था।
वैसे मिश्रा जी है बडे मेहनती। पूरे छुट्टी, स्कूल के आस पास सफाई करवाई। पेड़ लगवाए। हर क्लास में एक पूजा की जगह बनवाई। स्कूल में चार अध्यापक थे, राम चरन जी भंगी थे। उनको एक दिन बोले, "आपकी घर की स्तिथि ठीक नही है। बूढ़े माँ बाप और बेरोज़गार भाई। आपको विध्यालय आने की ज़रूरत नही है। आराम से घर मे रहिए। आपके क्लास में खुद ले लूँगा।"
जुलाई में जब क्लास शुरु हुए तो मिश्रा जी ने एक एक कर सभी दलित, आदिवासी और मुस्लिम बच्चो को अपने ऑफ़िस मे बुलाया। "तुमसे पढ़ाई नही होगी। तुम्हारी हाजरी लग जाएगी। रोज़ रोज़ आने की ज़रूरत नही है। कौन सा तुम लोगो का पढ कर कुछ होना है। कुछ काम सीखोगे तो घर में पैसे आयेंगे, अगली कक्षा मिल जाएगी।"
कोई छोटा बच्चा आ जाता तो उसकी गलती निकाल कर इतना पीटते की बच्चे स्कूल आने से डरने लगे।
आज संबलन है। गाँव मे से सीधे साधे कुछ अभिभावक को दो दिन पहले बुला कर उनको बताया की क्या कहना है। कैसे पेश आना है।
जैसे ही संबलन (राजस्थान मे स्कूल इंस्पेक्शन) की टीम घुसी, किसी ने इशारा किया और बच्चे जोर से गायत्री मंत्र पढने लगे। क्लास मे घुसे तो पूजा स्थान मे दो मिनट पहले दिया जलाया था। गुरु जी चार इंच लंबा तिलक लगाए हुए थे। उनकी लम्बी शिखा, उनके बेहद सौम्य स्वभाव की सूचक है! बच्चो मे सिर्फ ऊँची जाति के। सब के सब संस्कारी! बाकि सब की छुट्टी!!
(ये सच्ची कहानी है, सिर्फ नाम बदल दिये गए है!)
#शिक्षा
महिलाओं के लिए पहला स्कूल एक जनवरी १८४८ में माई सावित्रीबाई फूले ने चलाया। आज उनका जन्मदिन है। उनका साथ देने वाली फ़ातिमा शेख़ थी। इसके एक साल बाद कोलकाता का पहला लड़कियों का क्रिश्चन स्कूल और चार दशक बाद जालंधर में आर्य कन्या विद्यालय खुला।
इसके बावजूद बहुजन और मुस्लिम महिलाएँ शिक्षा का स्तर अभी भी बहुत पिछड़ा है।
हमारा परिवार कट्टर आर्यसमाजी होने के कारण लड़कियाँ पढ़ गई पर ढेरों ऐसे बहुजन और मुस्लिम परिवार मैंने देखे है जहाँ लड़के के पढ़ाई को प्राथमिकता देने के कारण लड़कियों को मौक़ा ही नही दिया जाता है। लड़के चाहे लड़की के मुक़ाबले पढ़ने में बिलकुल पिछड़ा हो तो भी लड़के को ही धक्का मारा जाता है। लड़कियाँ बिना सही मार्गदर्शन के भी पढ़ पा रही है ये बहुत बड़ी उपलब्धि है।
आज ज़रूरत है की बहुजन और मुस्लिम समाज लड़कियों को शिक्षा में बराबरी का अधिकार दे। एक लड़का पढ़ता है तो सिर्फ़ वही पढ़ता है पर एक लड़की पढ़ती है तो आने वाली सभी पीढ़िया पढ़ती है!
#FirstTeacher #SavitriPhule
हिमाचल को अब तक देख कर ये कथन ऊपरी तौर पर सच होता दिखता है पर यहा हम शिक्षा के दुषप्रणाम देखने आए है। बाकी लम्बी पोस्ट रूरल प्रेकटिनम पूरा होने के बाद लिखूँगी फ़िलहाल ये ज़रूरी बिंदू है:
- सिर्फ कोई भी शिक्षा नही; सही शिक्षा ज़रूरी है।
- शिक्षा लोकल कल्चर को सम्मिलित करके होनी चाहिए। नही तो हम संस्कृति का विनाश कर रहे है।
- जो शिक्षा हमें समुदाय से अलग कर व्यतिवादी बनाए वो विघटन पैदा करेगी। हमारा संविधान समुदाइक मूल्यों की बात नही करता! ये हमारी नींव की बहुत भारी कमी है!
- पूँजीवाद नई पीढ़ी में व्यतिवाद की बचीखुची कमी पूरी कर रहा है!
राष्ट्रपिता ज्योतिबा फूले ने अशिक्षा देखी तो उसकी बात की। उनको श्रद्धांजलि देते हुए हमें सही शिक्षा को आगे ले जाना है!
आज का सबसे ख़ूबसूरत नज़ारा. सूर्यगढा (बिहार) के एक सरकारी स्कूल की लडकियाँ शहर की सडकों पर अपनी दावेदारी दर्ज़ करा रही हैं. इनका एक नारा था -
"आधी रोटी खायेंगे, हम भी स्कूल जायेंगे." - हमारे यहाँ की लडकियों की शिक्षा का पूरा इतिहास, पूरा दर्शन इस नारे में ढूढा जा सकता है.
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आहिस्ता - आहिस्ता ही सही, आज़ादी ज़मीन पर उतरने लगी है. .
आधी रोटी बेटियाँ ही क्यूँ खाएगी? पूरी नही खाएगी तो क्या पढ पाएगी?? देश में ५०-७०% औरतें कुपोषण का शिकार है जिसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ पर पड़ता है।
पुरानी पोस्ट पर मेरा कमेंट पढ़ कर जल्द के देश भ्रमण से जोड़ पा रही हूँ। ये जो अहसान की तरह चल रही स्कीम जैसे 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' और ढेरों अन्य स्कीम बहुत ही पितृसुलभ सोच है जहा वो जो टुकड़े पकड़ाए उस पर लड़कियों को उनके अहसान तले दब कर जैसा वो कहे करते रहना चाहिए। ऐसी दयालु पितृसत्ता बहुत हद तक कठोर पितृसत्ता से ख़तरनाक होती है क्योंकि ये प्यार दया परोपकार को हथियार की तरह इस्तेमाल करती है।
लड़कियों को हर इंसान की तरह बराबर हक है। अगर लड़के को पेट भर पौष्टिक खाना मिल रहा है तो लड़की का भी वही हक है। अगर लड़के को अपने मर्ज़ी की पढ़ाई करने के लिए सपोर्ट मिल रहा है तो लड़की का भी वही हक है। अगर लड़का १० बजे बाहर जा सकता है तो लड़की का भी हक है की वो बाहर जाए। अपने हक के कम कुछ नही। पितृसत्ता से कोई भी समझौता करना औरत को दोयम दर्जा देना है!
दोनो मंदिर है। एक शिक्षा का दूसरा धर्म का। पहले में मिड डे मील खाते मासूम बच्चे है जिन्हें इस मंदिर में रोज़ आना है समय बिताना है खाना खाना है पर व्यवस्था कुछ नही है। बच्चे ज़मीन पर बैठ कर खा रहे है। दूसरे में भक्त आते है जो रिश्वत दे कर अपने ग़लत कामों पर रियायत माँगते है। पर पक्का चबूतरा बना है! रिश्वत लेने वाले को न ठंड लगे न गर्मी पर उसे बढ़िया मंदिर चाहिए पर जो रोज़ पहले वाले मंदिर में शिक्षा लेते और देते है उनका किसी को कोई ख़्याल नही है!
स्वामी ब्रहमानंद, एक बहुत ही कर्मठ स्वतंत्रता सेनानी और समाज सेवी थे। पापा के वो आदर्श थे और बहुत ही नज़दीकी थे। उन्होंने अपना सारा जीवन बुंदेलखंड के सबसे पिछड़े इलाक़ों में शिक्षा संस्थान (स्कूल, कॉलेज) खोलने में लगाया। इतना कुछ करते हुए वो अपने खेत के बीच एक कुटिया में रहते थे। वो एमपी भी थे तो उन्होंने न ही सैलरी ली और न ही बंगला। वो सब कमाई बच्चों की शिक्षा में लगा देते थे।
४ दिसम्बर को उनके नाम पर तालकटोरा स्टेडियम में भव्य लोधी महोत्सव का आयोजन हुआ। पापा को ये बहुत ही अजीब लगा। उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि इस भव्य आयोजन की जगह समाज में शिक्षा के स्तर को सुधारना होता! उनके काम को आगे बढ़ाना होता!!
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