दुल्हा बिकता है
कितने भी बैंक बन जाए, गरीब को क़र्ज़ा आज भी गाँव के ज़मीन वाले ही देते है! वैसे गाँव के मज़दूर भी सात लाख का क़र्ज़ा ले कर लड़की की शादी कर रहे है। और २० दिन में लड़की को इतना मार पीट कर रीढ़ की हड्डी तोड़ कर लड़का मायके भेजता है कि लड़की कभी न वापस जाने की क़सम खा लेती है!
अब गरीब क्या करे?
नीची जाति के पुरुषों के लिए ऊँची जाति की लडकी से शादी करना अक्सर फ़ायदेमंद साबित होता है पर सिर्फ उसके निजी जीवन में। अपने परिवार और समाज से पुरुष हमेशा के लिए कट जाता है! उसका सर्कल ही अलग हो जाता है!
और औरत के लिए पति वही सही जिसका आर्थिक या समाजिक स्टेटस उसके परिवार के बराबर या ऊँचा! ऐसी शादियाँ बिना दहेज हो जाती है तो गरीब माँ बाप के लिए upward शोशल मोबिलिटी है। और लड़की से सवाल पूछा जाए की किससे ज्यादा नज़दीक है अपने परिवार से या पति से तो जवाब साफ परिवार से, पति से सिर्फ ज़रूरत भर की!
इसे इस्लाम में किसी और धर्म के लडकी या लड़के की शादी जैसा कह सकते है। वहा इस्लाम क़ुबूल करना पड़ता है यहा ऊँची जाति क़ुबूल हो जाती है!
(अपवाद न गिनाए अब)
"मुसलमानो में निकाह सवा रूपये और कुछ छुहारों से मुँह मीठा करने से हो जाता है।"
ये सिर्फ किताबी बातें है। ज़मीनी सच्चाई उलट है। ख़ूब दहेज और लेन देन चल रहा है। बेवा औरते बेटियों के निकाह को परेशान है घर वाले भी शादी के नाम पर कहते है क्या देगी!
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