सशक्तिकरण के अवरोध

"A big part of justice is understanding, or trying to understand, the emotional landscape of others."
Teju Cole.

डर कितना डरावना लगता है जब तक वो हम पर हावी होता है। कल शाम तीन किशोरियों का मन हुआ की हम उन्हें दौड़ा कर लाए। बढ़ती उम्र में लड़कियों को घर से निकालना बंद जो हो जाता है, सो सबसे पहली डिमाण्ड यही होती है, बाहर चले? हमें भी पता है चाहे पूरे दिन गतिशील होने के महत्व को समझाया जाए पर जब तक अनुभव हो तब तक सब बेमानी है। तीनों १२-१४ साल की थी पर दौड़ना शुरु किया तो मानसी दौड़ नही पा रही थी। कमजोरी के साथ दो मिनट में उसकी साँस फूलने लगी। कहने लगी मुझे नही जाना, थक गई मैं तो। हमनें कहा चलों कोशिश करो। जैसे तैसे २०० मीटर चले होंगे तो बहुत तेज़ आधी आने लगी और अंधेरा हो चला। मानसी बहुत बूरी तरह डर गई। "मुझे नही जाना, पेड़ गिर जाएगा, घर चलो!" हमनें कहा नही गिरेंगे तो बोली मेरी दीदी ने बताया कि आँधी में पाँच साल का बच्चा उड़ गया था। मैने पूछा आपने देखा, उसने जवाब दिया नही; मैंने पूछा दीदी ने देखा, तो बोली नही! पर उसका हाल ऐसा था कि लग रहा था कि बेहोश हो जाएगी। उसका हाथ कस के पकड़ बाक़ी दोनों चलती गई। आँधी और तगड़ी हो गई। हम आम के बाग़ से गुज़र रहे थे। इतने में हमनें देखा की जम के आमिया गिर रही है। फिर क्या था तीनों बाग़ में कूद गई। अपनी अपनी टीशर्ट में भर कर मेरी कुर्ता में भरती जा रही थी। काफ़ी होने पर मैंने कहा चलो आगे देखते है। आँधी के साथ हल्की बारिश भी होने लगी। सामने से एक भेड़ का झुंड रहा था। मैने मानने को गोद में लिया तो मानसी ने फ़ोटो खींची! फिर हम सब कुछ और आम इकट्ठा कर वापिस लोटने लगे। मानसी अब उछल रही थी।

"क्यों मानसी अब नही उड़ जाओगी? तोता उड़ खेला है तो बताओ क्या क्या उड़ता है?"

"पन्नी, काग़ज़, सूखे पत्ते.." कहते हुए वो हँसने लगी...

"मम्मी को कॉल करके बताना है हमने आम बिने!"

सच इतना मुश्किल नही है डर को पछाड़ना! जिससे डर लगता है उसे ही करने का नाम साहस है। ये मैं रोज़ होते देखती हूँ और हर ऐसी कहानी एक विश्वास जगाती है कि डर के आगे जीत है!!

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