माँ का जन्म बच्चा करता है

कल मेट्रो मे एक ५-६ महिने की बच्ची भूख की वजह से लगातार रोए जा रही थी। पर माँ उसे दूध नही पिला रही थी क्योकि मेट्रो पब्लिक जगह है। 
बड़ा अजीब लगा, हमे भूख लगती है तो क्या हम प्राइवेट जगह ढूँढते है? नही! तो बिचारे बच्चे को क्यो समाजिक हिचक की वजह से भूखा रखा जा रहा है!
हम तो शिवी को १० दिन की थी तब बाहर ले गई थी पूरे दिन के लिए, आराम से जब माँगा तब दूध पिलाया, तब से दो साल बच्चो को जहा भूख लगी वहा दूध पिलाया। लोग अकसर हल्की चुन्नी से बच्चे तो ढक लेते है पर मेरे दोनो बच्चे बिलकुल ढकना पसंद नही करते थे। बच्चे के लिए घर और बाहर में क्या अंतर। वो हमारी तरह खाना अपनी सहूलियत से खाते है। शिवी मेरे पेट पर हाथ फेरते हुए पीती थी और कबीर मेरे चहरे को छूते हुए।
एक माँ का वक्ष उसके बच्चो के लिए ही है! ये कैसे समाजिक कायदे जो ममता का ही गला घोटें!!
और हाँ जहा तक देखने वालो की बात है, अगर हर माँ सहजता से पिलाएगी तो किसी को कोई उत्सुकता ही नही होगी!

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