घाघपना
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियां खा कर बे-मज़ा न हुआ
मिर्ज़ा ग़ालिब ये न जाने किसके लिए कह गए हैं पर जब दो साल पहले सुना तब अपनी बेशर्मी पर एतबार होने लगा था।
वैसे गालियाँ खाने का अलग ही मज़ा है अब।
पहले चुल्लू में डूब मर जाते थे, अब मक्खन की तरह तैर जाते है!
कबीर तो सुन लिया, अब ख़ुद की सुन साधो!
हाँ ये समाज शर्म के नाम पर दूसरों को नचाता है बचपन से बड़े होने तक। जब हम दूसरों को उसी पर चलाने लगता है। दूसरी तरफ मम्मी की एक बात हमेशा याद रहती थी, जिसने की शर्म उसके फूटे करम!
पर सही मायने में हम जिस बेशर्मी की बात कर रहे है ये जानना ज़रूरी है। क्यूँ की जब आपके ऊपर किसी की बात का कोई फ़र्क़ नही पड़ता तो आप मोटी चमड़ी वाले कहलाए जाते हो, जिसे अकसर संवेदनशीलता न होना माना जाता है। बेशर्म वो है तो बच्चे की तरह कुछ भी करने, कहने, सोचने में डरता नही। वो अंजाने रास्तों पर अकेले चलने की हिम्मत रखता है। वो जो पचासों बार गिर जाये तो भी वापस उठने की हिम्मत रखता है। वो जो अगर ग़लती हो जाए तो आत्म ग्लानि के साथ स्वीकार कर लेता है। वो जो खुद को बिलकुल उधेड़ कर रख देता है बिना ज़माने की परवाह किये। वो जो हर तरह की आलोचना को दिल से लगाए बग़ैर उसकी समीक्षा कर सके। जो ग़लती के अहसास पर खुद में बदलाव लाने से न डरे।
शर्मिंदगी का गहना हमें अपने बोझ तले दबा डालता है और हमें जड़ बना देता है। चिढ़ना चिढ़ाना, बेइज़्ज़त करना, आँखों की हया, किसी का तिरस्कार करना, खुद को कमतर समझना या किसी को नीचा दिखाना, लोक लाज की बातें, शिष्टता के नाम पर बाँधना - ये सब शर्म के आधार पर बने समाज की परिकाष्ठा है! थोड़ा सोचेगें तो साफ समझ आयेगा की कमजोर को कमजोर बनाए रखने में, बहिष्कृत करने में शर्म का कितना बड़ा हाथ है। औरत के लिए तो शर्म एक गहना ही बना दिया पितृसत्ता ने! दलितों का तिरस्कार करना भी उन्हें शर्मिंदा करने के लिए ही है! इस बहिष्कृत समाज की शर्मिंदगी छूटेगी तभी जाति टूटेगी, ऊँच नीच की दीवारें गिरेंगी, पितृसत्ता डगमगाएगी और एक प्रखर प्रबुद्ध समाज का निर्माण संभव है!
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