माँ री, इब ये बता ये किशोरी कौन होवे?
हम अभी बच्चे हैं,
उम्र में सभी कच्चे हैं।
काम का हम पर बोझ न हो,
बचपन में ही ब्याह न हो।
ये नारा मैंने महिला हिंसा विरोध दिवस के लिए बनाया था। तब तक हर किसी का यही कहना था की सहारनपुर में तो बाल विवाह नहीं हो रहे। पर ये जमीनी सच से अलग था. बस में जाते हुए अकसर बहुत कम उम्र की माँ दिख जाती। पर वहाँ उम्र नहीं पूछी जा सकती हैं। पर एक बार एक मुसलमान लड़के ने गाँव से कलसिया अपनी बाइक में उठाया। परिचय के बाद बताने लगा की लड़की को १३-१४ के बाद नहीं पढ़ाना चाहिए। उंच नीच हो जाती हैं। लड़की भाग गयी तो उलटे बदनामी। माहौल अच्छा नहीं हैं गाँव में। शहर में पढ़ा लेते होंगे, गाँव में लड़की को लेके कोई रिस्क नहीं लेता. फिर गाँव में संघ बैठक में जाते तो महिलायें टाल देती, चमार में बाल विवाह नहीं होते, मुसलमानों में होते होंगे। पर जिस भी ३५ - ४० से ऊपर महिला से पूछते तो बताती हमारी १३-१४ में शादी हुयी हैं।
पहले लड़कियों की शादी ८-१० की उम्र में भी हो जाती थी पर चाला (गौना ) ८-१० साल बाद ही होता। अगर कम उम्र में ससुराल चली भी जाती थी तो सास बेटी की तरह बहु को रखती थी और अपने पास सुलाती थी जब तक वो तैयार नहीं हो जाती थी पूरी तरह से। लड़के भी बहुत जानकार नहीं थे और इस प्रथा का पालन करते हैं। आज समय बदल रहा हैं, मीडिया का प्रभाव बच्चों पर भी हैं। लड़की १४-१५ की होगी तो भी थोड़ी बहुत जानकार हैं, लड़का १७-१८ का तो होता हैं और पोर्न इत्यादि से जानकारी ले चूका होता हैं। पर ये अधपकी और भ्रमित करने वाली जानकारी से लड़के-लड़की दोनों सही तरीके से सम्बन्ध बनाने के लिए तैयार नहीं होते। यौन शिक्षा के सबसे जरुरी पहलु - एक दुसरे की सहमती और सुरक्षित सम्बन्ध की जानकारी नहीं रखते। लड़की का शरीर बच्चे के लिए तैयार नहीं होता। मानसिक तौर से वो बच्ची ही होती हैं। किशोरिअवास्था क्या होती हैं उससे वो पूरी तरह अनजान रह जाती हैं। बाल विवाह से वो बचपन से सीधे व्यस्कता में कदम ले लेती हैं।
पर काउंसलिंग के दौरान सब सच सामने आने लगा। महिलाएं न सिर्फ जल्द में हुए बाल विवाह का जिक्र करती हैं, बल्कि इसे एक उपलब्धि की तरह साझा करती हैं।
"कितने बच्चे है?"
"दो!"
"कितने बेटे बेटियाँ?"
"२ बेटे ५ बेटी।"
"बेटी बच्चों मे नहीं आती?"
(मुस्कुरा कर) "हाँ जी! सबकी शादी हो गई!"
"सबसे छोटी की क्या उम्र है?"
"वो १८ की होगी। मैंने १५ में शादी करदी, अब तो तीन जाकत (बच्चे) है उसके!"
गाँव की महिलाएँ सच में इतनी भोली होती है कि सोचती है की उनकी ये कहानी सुन कर मैं उन्हें शाबाशी दूँगी!
अगर बाल विवाह पर कोई गतिविधि हो चुकी हो, और महिलाओं को बाल विवाह- ज्यादा बच्चे - ख़राब स्वास्थ - अशिक्षा - गरीबी का कुचक्र समझ आ चुका हो तो फीडबैक में या काउंसलिंग के दौरान ये कबूल करती हैं की मैंने बेटी/ पोती की १४-१५ साल में शादी कर दी, पर आगे ये न हो समझ आ गया हैं।
एक बुजुर्ग महिला बिना कुछ बताने लगी की उसने सभी पोती की १५ साल में शादी करवा दी। तब उन्हें समझ नहीं थी। अब वो विरोध करेंगी। इसी तरह एक महिला ये फीडबैक में कसम खायी की अब तक जो हुआ सो हुआ, आगे वो परिवार / गाँव में बाल विवाह नहीं होने देगी।
एक बात फिर भी नहीं समझ आई, इतनी ऊँची ऊँची डींगे हांकने वाले मर्द महिलाओं और लड़कियों से जुडी समस्या क्यूँ नहीं समझ पाते?
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