तबाह बचपन
गरीब मजदूर परिवार के लिए बच्चे सिर्फ दो हाथ हैं जो उनकी पारिवारिक आय में योगदान दे रहे हैं। ४-५ साल से १८-२० साल तक उसको पूरी तरह आश्रित बना कर रखने का मतलब हैं कि या तो मजदूरी बढ़े या अपने ही हाथ बढ़े। दोनों ही जब संभव हो तो नन्हे हाथों को खुद के लिए मजदूरी करने के लिए झोंकने के अलावा उनके पास कोई और चारा नहीं रहता।
सरकार बाल मजदूरी रोकने के लिए कितने भी प्रचार करे पर ये तब तक नहीं रुकेगी जब या तो मजदूरी बढ़े या सामाजिक सुरक्षा बढ़े। मुंबई में सोशल वर्क की पढाई के दौरान पढ़ा एक पेपर ध्यान आ गया। उसमे हमारे सामाजिक समस्याओं की सवर्णों की समझ पर परिहास था।
- Savarna logic of social problems in India
हिंसा अशिक्षा के कारण हैं। अशिक्षा स्कूल छोड़ने वालों के कारण हैं। स्कूल छोड़ना गरीबी के कारण हैं। गरीबी जनसँख्या के कारण हैं। जनसँख्या विकृति के कारण हैं। विकृति मानसिक बीमारी के कारण हैं। मानसिक बीमारी हिंसा के कारण हैं। ये सवर्ण तर्क कुछ ज्यादा ही सीधा हैं। यहाँ कुछ भी इतना सीधा नहीं हैं।
महिलाओं से काउंसलिंग के दौरान हुयी बात इन इंसानी जटिलताओं को उजागर करता हैं। हमारी सोच, संस्कृति से बनती हैं। जहां लड़कों की लायकी शिक्षा न हो कर रोजगार हो तो शिक्षा तो ओवरहेड हैं जो उनके लिए अजनबी ख्याल हैं।
"तीसरे बेटे के बारें में बताओ?"
"वो जलेबी की दूकान करता हैं."
"अच्छा क्या उम्र होगी?"
"तगड़ा हैं मेरे जितना हो रहा हैं!"
"कितना पढ़ा हैं?"
"तीसरी तक. फिर आवारागर्दी करता था तो एक भाई के यहाँ प्लेट धोने पर लगा दिया था, तो सुधर गया."
"क्या उम्र थी उसकी तब?"
"तब तो तनक सा था." (हाथ से उच्चाई बताते हुए)
"क्या उम्र होगी तब?"
"सात बच्चों में सब में सबसे छोटा अभी दूसरी में हैं लागलो हिसाब. सबमे १-२ साल का अंतर हैं. हमें आता हिसाब तो कलेक्टर न बन जाते."
"फिर तो अभी वो १४-१५ का होगा?"
"हाँ इतना ही होगा!"
"कहा हैं दूकान?"
"पीठ बाज़ार में लगाता हैं, सबसे ज्यादा वही कमाता हैं. बचपन में लगता था बीरान हो जायेगा. बचपन में काम में लगाया तो सुधर गया! हम दोनों से तो अब काम नहीं होता."
"जमीन नहीं हैं?"
"ज़मीन थी वो बेच दी सास के तीज पर लड्डू बनवाए. नहीं तो कर्जा लेते."
"आपको नहीं लगता बच्चों को पढ़ाना चाहिए?"
"पढ के कौन से नौकर लग रहे."
"पढाई सिर्फ नौकरी के लिए होती?"
.....
"वो जलेबी की दूकान करता हैं."
"अच्छा क्या उम्र होगी?"
"तगड़ा हैं मेरे जितना हो रहा हैं!"
"कितना पढ़ा हैं?"
"तीसरी तक. फिर आवारागर्दी करता था तो एक भाई के यहाँ प्लेट धोने पर लगा दिया था, तो सुधर गया."
"क्या उम्र थी उसकी तब?"
"तब तो तनक सा था." (हाथ से उच्चाई बताते हुए)
"क्या उम्र होगी तब?"
"सात बच्चों में सब में सबसे छोटा अभी दूसरी में हैं लागलो हिसाब. सबमे १-२ साल का अंतर हैं. हमें आता हिसाब तो कलेक्टर न बन जाते."
"फिर तो अभी वो १४-१५ का होगा?"
"हाँ इतना ही होगा!"
"कहा हैं दूकान?"
"पीठ बाज़ार में लगाता हैं, सबसे ज्यादा वही कमाता हैं. बचपन में लगता था बीरान हो जायेगा. बचपन में काम में लगाया तो सुधर गया! हम दोनों से तो अब काम नहीं होता."
"जमीन नहीं हैं?"
"ज़मीन थी वो बेच दी सास के तीज पर लड्डू बनवाए. नहीं तो कर्जा लेते."
"आपको नहीं लगता बच्चों को पढ़ाना चाहिए?"
"पढ के कौन से नौकर लग रहे."
"पढाई सिर्फ नौकरी के लिए होती?"
.....
इन किस्सों को क्या नाम दूं. बहुत बार लगता हैं अपना सर फोड़ दूं. एक समस्या हो तो उसे पकड़ो. गरीबी अशिक्षा रुढ़ीवादिता पितृसत्ता सब ने ऐसे जकड़ा हुआ हैं कि इस कुचक्र से निकलना टेड़ी खीर हैं।
"बेटा ज़रा चाय लाना।"
और एक नौ साल का बच्चा चाय ले कर आता है। यह बहुत ही आम है, कही भी चले जाइए। वो उम्र जो बच्चे की पढने की है वो आप जैसे लाट साहबों के घर और दफ़्तर में लगा रहा होता है। अपने निकम्मेपन से हम औरो को भी निकम्मा बना रहे है। हाथ पैर सब चालू हालत मे है पर खुद का काम करने के लिए हमे नौकर चाहिए। एक ग्लास पानी पिलाने के लिए या हमारे झूठे बर्तन साफ करने के लिए।
वो बच्चा अगर ऐसे में कुछ पढ़ता या कोई काम सीखता तो शायद अच्छे स्तिथि में होता। यही बात ड्राइवरों की है। आप गाड़ी चला सकते है पर बिना शौफर के चलना आपकी शान से कम है।
श्रम सस्ता होने का मतलब से नही की हम इतने लो स्किल काम को बढ़ावा दे। हमारी अमीरी ग़रीबी के बढ़ते हुई खाई के लिए यही निकम्मापन ज़िम्मेदार है।
आश्चर्य की बात यह है की यही निकम्मे लोग फिर बात करते है दमन, बच्चों की दुर्दशा और दूसरों के निकम्मेपन की!!
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