समझौता बनाम फ़ैसला

Anyone in an unhappy and irreconcilable marriage- get out of it. Life is too short and too wonderful to stay unhappy.

And no, less divorce rate does not mean couples are more happy- it just means that patriarchy, legal systems, lack of women participation in the economy, and pressures from families and societies make them bonded together against their wills.

Hopefully, as more women become financially independent and societal norms relax, divorce will be freed of social stigma, and people will be able to place their happiness above a sense of false morality.

विवाह संस्था वैध बच्चे  पैदा करने के लिए बनाई गयी और विवाह की उपलब्धि है बच्चे । ताकि उत्तारधिकार की सम्पत्ति एक परिवार, एक जाति, एक धर्म में स्थानांतरित होती रहे। औरत का सम्मान तभी है जा वह पुत्र पैदा करे। पुरूष घर में हमेशा मौजूद नहीं रहता कमाने की ज़िम्मेदारी उठाता वह देश , गाँव, शहर डोलता रहता है। घर में सुविधानुसार उपस्थिति दर्ज कराता रहता है। घर उसके नहाने- धोने, कपड़े बदलने, थकान उतारने, खाने की जगह है।वो घर लौटता रहता है ।कमा कर लाता है इसलिए वेषेशाधिकार उसे मिले हैं। उसकी आवाजाही, ग़ैरमौजूदगी का कुछ प्रमाण नहीं। पत्नी घर बैठे बच्चे पैदा करती, पालती है, उनके मोह में अपना जीवन अपनी अस्मिता खो चुकी होती है। वो ख़ुद को एक समय तक पति से फिर बच्चों से परिभाषित करती है। उसे यही भान है वो किसी की “पत्नी” है फिर बाद में वो किसी की “माँ” है । शायद उसे याद नहीं रहता उसके पास एक दिल और दिमाग है जिसे किसी रीढ़ ने सम्हाला है वो स्तनधारी , गर्भाशययुक्त मादा मात्र नहीं है। 
अगर भारत में महान संस्कृति ,महान परिवार ,महान विवाह की नींव देखी जाए तो वहाँ बहुत से अधमरे, कराहते, निरपराधी स्त्री - पुरूष मिलेंगे। वो वहीं घुट घुट के मर गये क्योंकि उन्हें महानता का तमग़ा चाहिए था। जाति, धर्म, परिवार की सेवा करनी थी । इसी उद्देश्य से उनके माता- पिता ने उन्हें जन्म दिया था । उन्हें कोई आइंस्टाइन , मैडम क्यूरी, अपाला , घोषा, ज़बाली, कबीर, सुकरात , मंडेला, लिंकन नहीं बनना था। नोबेल पुरस्कार नहीं पाना था। 
अगर आज विवाह की ही तरह तलाक़ को सम्मान स्वीकृति हासिल हो जाए तो देश में कितने लोग विवाह के भयावह घुटन से बाहर निकल जायेंगे। कितने सामाजिक अपराध कम हो जायेंगे। मध्यवर्गीय झूठी नैतिकता भरभरा के गिर जाए।अगर प्यार नहीं है तो किसी रिश्ते में कौन सी सच्चाई बची ? जैविक ज़रूरतों की पूर्ति फिर एक- दूसरे का मानसिक शोषण । जिसमें रोज़ आत्मा का क़तरा क़तरा पिघलता है । टूटे दिल की किर्चियां अपने ही पाँवों में धंसती हैं ।

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