नशा - मौत का सामान

Whatever it is I’m addicted to, or ever have been addicted to, it’s not what it is but what it does – to me, to you, to anyone. Anything we’ve ever craved helped us escape emotional pain. It gave us peace of mind, a sense of control and a feeling of happiness.

सहारनपुर में कल से हुई दर्जनों मौतें हमारे लिए कोई बहुत बड़ा सरप्राइज़ नही है। पिछले छह महिने में फिल्ड पर काम करते हुए इलाक़े के परिवारों की सबसे बड़ी समस्या की तरह देख रही हूँ। पुलिस/ आबकारी/प्रशासन एक तो आते ही नही और आ भी गए तो सिर्फ ले दे कर मामला रफ़ा दफ़ा करने के लिए। घर घर में भट्टी है और १०-१२ साल के बच्चे भी शराब में ज़िंदगी बर्बाद कर रहे है! बहुत सी एकल महिलाएँ भी शराब बनाती है क्योंकि ये घर में बैठ आसानी के हो जाता है और सौ रुपए बोतल बिक जाती है। और एक बार लत लग जाए तो फिर ज़मीन/ पूरा घर का सामान/ अनाज बेच बेच कर पीने लगते है! शराब की खपत का सबसे बड़ा कारण आसानी से मिलना है! घर घर बनेगी तो खपत तो बढ़ेगी ही!
नशा अपने में एक समाजिक समस्या है जिसपर बहुत कम काम हो रहा है!! महिलाओं की यथास्थिति के पीछे पुरुषों की शराबखोरी बहुत हद तक ज़िम्मेदार है। होश में ही इंसान परेशानियों का सही से सामना कर पाता है और उनसे उबर पाता है!
तमाम ऐसे मयकश जो अगुवा अवांगर्द रहे रुड़ियों की खिलाफत करने में उनके लिए शराब संबल थी या लाचारी ? लाचारी! वो समाज की बुराइयों को झेलने का सामर्थ्य नही रखते थे। नशा उनके अंदर के दर्द को बाहर लाने का काम करती रही। बहुत कम नशे की हालत में लिखने या गाने की ताक़त रखते है! होश में होते तो हक़ीक़त का सामना पड़ता जो उनके बस का नही था।
इनके परिवार को इनके नशाखोरी का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा। बाकि शराब के समाजिक कारण कम नही है। जिन गाँवों में पुरुष ज़्यादा शराब पीते है वहाँ के आम जनजीवन पर ख़ासकर महिलाओ और बच्चों के जीवन पर पर बहुत ख़राब प्रभाव पड़ता है। घर बर्बाद होना महिलाओं से हिंसा बच्चों पर ध्यान न देना मौहोल उदासहीन होना - कुछ प्रभावों में से है!

शराब या वाईन का इतिहास पढो ! बर्बर उत्सवधर्मिता थी शराब और तब तमीज ईजाद नहीं हुई थी ... बाद में चलन बनी अमीरों के लिए रंग अय्याशी का प्री-कोर्स और थके मजदूरों के लिए नींद का पेय...

आज तनाव और अकेलापन को भले वक्ती राहत दे पर भीतर की ज़िद्द को क्षीण कर देती !

रही उत्सवधर्मिता तो समाज में और बहुत संवेदनाओं को समेटने बेहतर करने के काम हैं... नशा नहीं !
Yuva Deep

शराब के दुश्प्रभावों से कौन परिचित नही है। मैंने दो पियक्कड़ों को बेहद नज़दीक से देखा है। नशा जब आदत बन जाती है तो इसका बुरा असर हमारे रिश्तों में सबसे ज़्यादा पड़ता है। 

नशा कायरों का सहारा है। ये ख़ुद से भागने में मदद करता है। आपकी दबी हुई डिजायर्स खुल कर ऊपर आ जाती है जिससे आप किसी जानवर से कम नही रह जाते। फ्रायड का ID आप पर हावी हो जाता है और आप अपनी वासनाओं के ग़ुलाम हो जाते हो!

न जाने कितनी ग़लतियाँ, कितने अत्याचार, कितनी हत्याएँ, कितनी आत्महत्याएँ इस एक के कारण होती है। और हम व्यक्ति को दोष देते है!

नशे और शराब से बर्बाद हो रहे परिवारों की कहानी सुन कर ये तो यक़ीन हो गया है की नशा को चलाते रहने का काम भी पत्नी और बच्चे ही करते है। पत्नी छोटा मोटा काम कर कमाने लगती है, छोटे छोटे बच्चे बाल मज़दूरी करने लगते है पर अपने पति या पिता को ज़िंदा रखने की जद्दोजहद में नशे के लिए पैसे देते रहते है! 

जिस दिन पत्नी और बच्चे पैसा देना बंद कर देंगे न जाने कितने परिवार इस चक्र से कुछ समय के लिए आज़ाद हो जाएँगे! एक बार कमाने लगे तो बच्चे ख़ुद नशे की लत में पड़ जाते है। 

नशे और शराब के कुप्रभाव तो समझ आते है पर इनके मनोवैज्ञानिक कारण क्या होते है ये अभी मैं ठीक से नही समझ पाई हूँ! अमीर अय्याशी करे समझ आता है पर जहा बच्चों को खाना खिलाने के पैसे न रहे ऐसे पुरुष को नशे की लत क्यों हो जाती है ये समझ पाना मुश्किल है। कुछ हासिल न कर पाने की आत्मग्लानि, मालिक और ऊँची जाति द्वारा तिरस्कार को सहना, अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा न कर पाने पर मिले ताने, अपने पुरुषत्व के ललकारने पर आक्रोश... इस शहरी प्रतिस्पर्धा की दौड़ मे एक हीन भावना जो उन्हे अंदर ही अंदर ख़त्म कर देती है।
कौन कहता है पितृसत्ता पुरुषों को ताक़तवर बनाती है! ये दीमक किसी को नही छोड़ती बस समय समय की बात है!
अजीब इंसानी फ़ितरत है। आबकारी विभाग का काम है अवैध शराब रोकनी, उसके लिए चाहे उसके लिए आपको रोज़ दबिश करनी पड़े। पर जब कई सारी जाने चली जाती है तब शुरु होती है ताबड़तोड़ दबिश। और हज़ारों लीटर शराब पकड़ी जाती है। 
पहली बात कि कितने अवैध शराब बनाने के कारख़ाने बंद हुए इनकी कोई जानकारी नही दी जाती। 
दूसरी बात ऐसी ताबड़तोड़ दबिश भ्रष्ट आबकारी महकमे के लिए एक और तरीक़ा है अपनी तिजोरी भरने की।
तीसरी सबसे महत्वपूर्ण बात, क्या कोई भी अवैध शराब बिना आबकारी अफसरो की जानकारी के चल सकते है? न जाने इनके हाथ कितने मासुमों के ख़ून से लथपथ है!
खुद भी अपने को गुनहगार मानती हूँ क्यों कि एक दारू दरोग़े की न जाने कितनी राते दबिश के नाम पर मैने दबोच ली!
जिस जिले में घर-घर में कच्ची शराब की भट्टी है वहा का ज़िला प्रशासन एक दिन में तीन भट्टी बरामद करके क्या साबित करना चाह रहा है!!
शर्म नही आती मीडिया और प्रशासन को जो अख़बार पढ़ने वाली जनता की आँखों में धूल झोंक रहे है। सहारनपुर का तो बच्चा बच्चा सच से वाक़िफ़ है!

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