कंक्रीट के जंगल

मेरे टेरेस के साथी!
वो सफ़ेद और काले कबूतर की जोड़ी
वो नारंगी आँखों वाला पड़ोसी का बिल्ला
वो कौवों की काय काय
और कंक्रीट के जंगलों में उगता सूरज
सब बिलकुल घड़ी देख कर तय समय पर होता है
प्रकृति जैसे इस इंसानी आक्रमण से भी बेपरवाह है
आखिर कब तक? 
जब तक मैं पूरी चेतना से इनका हिस्सा बन
अपना तुलसी नींबू का काढ़ा पीती हूँ 
जब तक मैं अपने पैर ज़रूरत का पसारती हूँ 
जब तक मैं ठहर कर अपनी सासों को सुन सकती हूँ
बस तब तक!
आज शाम को गाड़ी चलाते हुए सैकड़ों निर्माणरत गगनचुंबी इमारतों के बीच ढलता सूरज, धूल और प्रदूषण की वजह से बहुत ही नीरस लग रहा था।
न जाने हम कितनी हरियाली को रौंद कर कंकरीट के जंगल खड़े कर रहे है। एक आदमी को क्या चाहिए, एक छोटा सा घरौंदा। इतने बडे बडे घरों का क्या औचित्य है? 
सिर्फ बर्बादी!!!

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