हिंसा का चक्र
सहारनपुर के मेरे चार महिने के गहन फिल्ड वर्क और आठ महिने की काउसलिंग के आधार पर जो देखा, सुना और महसूस किया, उस आधार पर कह सकती हूँ कि औरत अभी जगी नही है और उनके साथ जुर्म बढ़ते जा रहे है। जन्म से पहले से ज़िंदा रहने से शुरु हुआ संघर्ष उसकी हत्या, आत्महत्या या बीमारी से मौत से भी नही ख़त्म होता।
गर्भवती महिला को हॉस्पिटल न जाने देना, दवाई खा कर गर्भपात, किसी भी प्रकार के परिवार नियोजन का उपयोग न करना, लड़के के लिए आशा-डॉक्टर द्वारा सातवें महिने तक गर्भपात, छोटी सी रसौली होने पर डॉक्टर द्वारा बच्चेदानी निकलवाना।
पिता द्वारा बच्चियों का लैंगिक शोषण, बच्चियों को माँ से ज़बरन दूर कर प्रधान/एनजीओ द्वारा कही और भेज देना। बाल कल्याण समिति को बाइपास कर बच्चियों को स्थानीय ऐजेंसी को देना!
स्कूलों में लडकी-लड़कों को अलग कर देना, अलग ग्राउंड, क्लास में रखना, बात करने पर धमकाना मारना पीटना, साथ-साथ में कोई भी गतिविधि नही करवाना!
किशोरियों की पढ़ाई रोक देना, बाहर नही जाने देना, बाल मज़दूरी करवाना, ज़बरन बाल विवाह, प्रेम संबंध के बारे में पता चलने पर लडकी को धमकाना, मारना-पीटना; समलैंगिक किशोरियों को बाहर आने में जान से मरने का डर।
बच्चा या बेटा न होने पर प्रताड़ित करना, दूसरी औरत को ले आना, दूसरी औरत के आने पर पहली को बाहर निकाल देना, भाई के मरने के बाद भाभी के साथ रहने लगना और पत्नी को बाहर कर देना अगर आपत्ति करे, बहू के आने पर पत्नी को बाहर कर देना।
विवाहित महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा -शराब पी कर या शराब पीने पर, नशा/ जुआ करने पर, पति के काम नही करने पर, औरत के किसी अन्य से सम्बन्ध हो इसको ले कर, मोबाइल पर पाबंदी, बाहर जाने पर पाबंधी, किसी ग़ैर पुरुष से बात करने पर, फोन में रिकॉर्डिंग करना फिर हर बात पर तंग करना, बाहर काम करने पर पाबंदी, क़र्ज़ा पत्नी के नाम ले कर फिर ख़ुद बर्बाद कर पत्नी से उतरवाना
बिना मर्ज़ी संबंध बनाना, नशे में गोली डाल पर संबंध बनाना, गलत तरीक़ों से संबंध बनाना, भाई/ दोस्तों से ज़बरन संबंध बनवाना
अन्य प्रदेश (बिहार, बंगाल, ऑडिसा) की महिलाओं के ख़रीद फ़रोख़्त, उसे बच्चा न हो तो बच्चेदानी का ज़बरन ऑपरेशन करवा लेना।
विधवा को संपत्ति का हिस्सा न देना, विधवा को गाँव से बाहर निकाल देना।
बुज़ुर्ग माँ को ख़र्चा नही देना, पेंशन नही बनवाना, पेंशन छीन लेना, माँ बाप को बाँट देना, रहने की जगह नही देना, माँ को घर से निकाल देना।
पर औरतें अभी पुलिस कचहरी में नही जाने को तैयार है! अभी परिवार से लोहा लेने को बेइज़्ज़ती समझती है। सहने को अपनी नियती समझती है! ये हिंसा का चक्रव्यूह तोड़ने की जरूरत है। ये सभी के प्रयासों से संभव है!
(मैने भ्रूण हत्या, कम ऊम्र में शादी हुई लडकियों की बच्चे के जन्म के समय मौत, दहेज हत्या, हॉनर किलिंग जैसे मसले नही लिखे क्योंकि ये इतने जगह ले लेते है की अन्य प्रकार की हिंसा रह जाती है पर वो भी उतनी ही महत्वपूर्ण है)
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