असभ्य सभ्य की जमात
रात इतनी भी गहराई नहीं है
पर ये बयार थम क्यों गई है
जैसे सबकी सासें ही रुक गई है
इस शहर में जल रहे बल्ब भी बेजान है
क्योंकि जुगनू कही खो गए है
ख़ामोशी काटने को आ रही है
कुछ सुनने की तड़प गहरा गई है
पर झिंगुर शायद मातम बना रहे है
दुनिया में बहुत कुछ मर चुका है
बहुत से पेड़ कट गए बाक़ी गर्मी में झुलस गए
इंसानियत नहीं बची है
आत्मा बिक चुकी है
इस मुर्दा शहर में भला कौन रहता है
एक भौंकता कुत्ता
कुछ चंद टिटहरी
और ढ़ेर सारी भटकती रूहें
जिन्हें न इस जहाँ में सुकून था न उस जहाँ में..!
और ज़िंदा लोगों ने मुर्दों को दे दी है शमशीर
जिससे ये बनाएँगे क़ब्रगाह
इनकी प्यासी रूहें ख़ून चूसती है
झूठ मक्कारी और भ्रष्टाचार से
पिंजड़े में बैठ ये आज़ादी की बात करते है
गबन कर औरों की हक़ की बात करते है
ये असभ्य सभ्य, ज़ाहिल शिक्षित की जमात है
बस अजीब विडंबना ये है
सब ज़िंदगी के दूर भाग रहे है
और उसे तरक़्क़ी का नाम दे रहे है!
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