हाईरैरकी

किसी जगह, व्यक्ति, चीज को महिमामंडित करने से बाक़ियों की क़ीमत कम नहीं हो जाती। अजीब सनक है हम लोगों में हर चीज को हाइरैरकी में रखने की। ये भयंकर बीमारी है!
शायद हम में ये समझने का कभी विवेक पैदा होगा।
सम्मान से रुतबा भला
सत्ता का है देखो खेल 
हाइरेरकी बनाम हमारी छद्म लोकशाही - घर में, दफ़्तरों में, समाज में, राजनीति में, सरकार में..
और तो और समानता और नारीवाद सोच पर काम करने वाले समाजिक संस्थान में भी!
सब खडे़ है इस सीढ़ी पर अपनी जगह सुनिश्चित करने में
जो ऊपर है तो नीचे वाले को और नीचे कर ख़ुद को और ऊपर चढ़ा रहा है
ब्राह्मण कहे दलित से तुम नीच हो मेरा सम्मान करो 
बूढ़ा कहे जवान से तुम नए घोड़े हो मेरा आदर करो 
जवान कहे बच्चे से तुम कच्चे हो मेरा कहना मानो
अमीर कहे गरीब से तुम दरिद्र हो मेरी ग़ुलामी करो 
मालिक कहे नौकर से तुम गधे हो बोझा ढ़ो
अफ़सर कहे नीचे के कर्मचारी से तुम हुकुम बजाओ 
पुरुष कहे महिला से तुम पैर की जूती हो वही रहो
शिक्षित कहे अनपढ़ से ढोल हो समझ नही पाओगे 
बुद्धिजीवी कहे औसत दर्जे हो तुम्हारे लिए कोई मंच नही है
समाजिक कार्यकर्ता कहे क्लाइंट से मेरी कमाई के लिए तुम जहा हो वहा रहो 
सवाल करना मना है पर बदलाव चाहिए 
पहचान बनाना मना है पर भागीदारी चाहिए
निर्णय लेना मना है पर वोट चाहिए
आज़ादी मना है पर नए विचार चाहिए 
नई सोच मना है पर विकास चाहिए
विद्रोह मना है पर लोकशाही चाहिए
सत्ता का कुर्सी का मोह छोड़े नही छूटता
फिर चाहे मानव अधिकार सार्वभौम घोषणा से 
संविधान तक कुछ भी कहा गया हो!
हम एक कान से सुन दूसरे से निकाल देते है
हम आदी है हाइरेरकी बीमारी के
ऊपर वाले तो मज़े में है उन्हें मलाई जो मिल रही है
नीचे वाले नशा में भोग में और पेट भरने की जंग में डूबे है
फ़ुर्सत किसके पास है विद्रोह करने की
ये मुर्दों का शहर है
ग़रीब को गरीबी मार डालेगी 
अमीर को अमीरी खा जाएगी 
वैसे ये मरे हुए क्या ख़ाक लड़ेंगे 
ज़िन्दा रहना आसान नही है मुर्दों के बीच में 
तलाश में हूँ जिंदों की टोली की...!
रेप पावर के इंबैलेंस का नतीजा है, जिस समाज में हाइरैरकी नहीं है वहाँ रेप नहीं होते! सभी स्थापित धर्म - ब्रह्मणवाद, इस्लाम और ईसाई इस इंबैलैंस को बरक़रार रखते है इसलिए रेपिस्ट किसी भी स्थापित धर्म के किसी भी जाति का हो सकता है!
Laxman Singh Dev का ये स्टेटस किसी वॉट्सएेप ग्रुप में शेयर हुआ तो मैंने आज बात की! जिस लेफ़्ट, जेएनयू को हम सर आँखों पर चढ़ाते है वो बहुत ही घटिया अहम और favouritism का अड्डा भी है! बड़े आसानी से वो ब्राह्मणवाद से जिस आज़ादी की बात करते है उसे ही खाद पानी देते रहे है। बहुत बार ये कह चुकी हूँ दोबारा कहना चाहूँगी जेएनयू अगर ये है जो लक्ष्मण जैसे हज़ारों दलित आदिवासी ओबीसी को महसूस कराता है तो इसे ख़त्म होने में ही सबकी भलाई है! अच्छी यूनिवर्सिटी हर शहर में हो और सब में बराबरी हो, सबको मौका मिले। जिस हाइरैरकी से लड़ रहे है वही यूनिवर्सिटी में बना कर हम यहाँ के बच्चों और टीचरों में झूठा दम्भ ही पैदा कर रहे है जो भगवे से कम ख़तरनाक नही है!

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दलित छात्र रोहित वेमुला की शहादत दिवस पर कुछ बताना चाहता हूं।2004 में मैने jnu आर्ट्स एन्ड एस्थेटिक्स में एडमिशन लिया।प्रवेश परीक्षा में मेरी रैंक जनरल सूची में 3 थी।2006 में इंडियन कल्चर में यूजीसी नेट भी पास किया।जब mphil इंटरव्यू हुआ सभी कैटेगरी में मैं अकेला था जिसके पास नेट था।।2006 में mphil की एंट्रेंस होने के बाद हुए इंटरव्यू में सीताराम येचुरी ( लेफ्ट का बड़ा नेता) की साली रंजनी मजूमदार ,(सिफारिश से असिस्टेंट प्रोफेसर  बनी)और प्रगतिशील अभिनेत्री स्वरा भास्कर की माता इरा भास्कर ने 30 में से 2 नम्बर देकर बाहर किया।किसी भी दलित /ओबीसी / मुस्लिम / आदिवासी को इतने नम्बर नही दिए गए जो किसी जनरल के न्यूनतम थे।किसी भी जनरल छात्र के 24 से कम अंक नही थे।केरल के पहले कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नंबूदरीपाद के पोते अमीत परमेश्वरन को 30 में से 30 नम्बर दिए।जनरल कैंडिडेट के न्यूनतम अंक 24 थे।बाकी सब sc st ओबीसी, मुस्लिम कोई भी 18 से ऊपर नम्बर नही पा पाया(जो सभी saa से पास आउट थे) अपने चहेतों को प्रवेश दिलवाने के लिए एंट्रेंस लेने के बाद बिना नोटिफिकेशन के योग्यता ही बदल दी।इस मुद्दे पर बाद में मैंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और हार गया।कोर्ट ने कहा यूनिवर्सिटी की ऑटोनोमी है।इसी विद्यालय saa में एक टीचर है जिसके पास सम्बंधित विषय मे ना मास्टर डिग्री है,पीएचडी, mphil ,नेट/jrf ।कुछ भी नही है।आज वो jnu में प्रोफेसर है ।क्योंकि उसके पिता लेफ्ट के नेता थे।उस साल 3 जनरल छात्रो को 30 से में 30 नम्बर दिए गए ,जिनमे 2 ऐसे थे जिन्होंने कभी आर्ट्स एन्ड एस्थेटिक्स की पढ़ाई कभी नही की।2 साल पहले लेफ्टिस्ट टीचर के उत्पीड़न के कारण एक दलित छात्र ने jnu में आत्महत्या भी की थी।लेकिन लेफ्ट का होने के कारण मुद्दा नही बना।हर साल ऐसे ही होता है।दलित / stछात्रो को हमेशा कम नम्बर दिए जाते हैं।और देने वाले ज्यादातर लेफ्टिस्ट हैं।।हरी घास में छुपे हरे सांप= jnu के लेफ्टिस्ट।और फ्रीडम चौराहे पर जातिवाद के खिलाफ बोलने में भी ये आगे थे।गजब ढोंग है।

ज़हरीला संघी प्रोपागेंडा इस समाज में महामारी की तरह फैल चुका है। इसका हल सिर्फ आपसी विमर्श से नही होगा। एक ज़मीनी एंटी मूवमेंट की ज़रूरत है। जो इस सच को माने की आम आदमी बरगलाया जा चुका है। असली दुश्मन अब एक नही रह गया। उसके अंश पूरे समाज में बिखर गए है। दिक़्क़त ये है हर एंटी मुवमेंट भी वही तरीक़े अपनाने लगता है जिसके ख़िलाफ वो खड़ा होता है। आप  देवी देवता के ख़िलाफ हो तो अपने में से वो सोच ख़त्म करो। आप हाइरेरकी के ख़िलाफ हो तो पहले अपने अंदर ख़त्म करों। 
किसी भी इवेंट में चले जाओ ये नही दिखा तो कहना। मुझे तो हीरो वर्शिप और हाइरेरकी देख कर ही अंदाज़ा लग जाता है की ये कोई एंटी मूवमेंट हो ही नही सकता!
चलिए आपको एक ग़रीब ब्राह्मण की कहानी सुनाती हूँ। बड़ी मुश्किल से उनके माँ बाप ने अपनी झोपड़ी मे रह कर उनको पढ़ाया। पढ कर वो जेएनयू आ गए। वहा सभी की तरह रट रटा कर सिविल सर्वेंट बन गए। 
किसी मिनिस्टर की बेटी से शादी हो गई। महान बनने की चाह में दहेज तो नही लिया पर पत्नी के साथ २ करोड़ का बेंक बेंलेंस साथ आया। ख़ैर पत्नी मायके मे रहती है और जनाब पोस्टिंग पर।
अब अफ़सर बन गए है तो ऐंठ तो पूरी होगी। एक बार कहीं गए तो गेट पर गार्ड की पिटाई कर दी क्योकि उसने कुछ ज्यादा सवाल पूछ लिए। बाकी कल किसी का पोस्ट था की निजी मामले शेयर नही करने चाहिए, और लोगो को माफ़ कर देना चाहिए। अगर गार्ड मर जाता तो "शायद" न्यूज़ बन जाती! पर बैकग्राउंड तो कोई जानने वाला ही बता सकता है। वरना ऐसे ही ग़रीब ब्राह्मण पैदा होते रहते और ऐसे ही गार्ड पिटते रहते!!
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आज हाइरैरकी (hierarchy) पर एक बहुत अच्छा लेख पढ़ते हुए ये क़िस्सा याद आया। एक सरकारी अफ़सर की मज़ाक़ मे कही बात बहुत भा गई, "जब कोई मूवी किसी अफ़सर के आने से पहले लोगो ने आधी देख ली हो और बाकी सब के असुविधा को नज़रअंदाज़ करते हुए शुरु से चलानी पड़े तो समझ ले की वो वाक़ई बड़ा अफ़सर है!"
आज हम पश्चिम से कोई पोलिसी ले कर आते है, सोचते है उसको हमारे यहा लागू करेंगे और जादू हो जाएगा। एलाइट अफसर अपने शीशे के दफतरों मे बैठ कर पूरे देश के लिए कुछ बनाएगा और हर प्रदेश का देशी (vernacular) आदमी आँख बंद कर उसकी कही मानेगा और चमत्कार हो जाएगा। और जो होता है वो बहुत ही ख़तरनाक होता है। हर क्रियान्वयन करने वाले (implementing) अफसर कोप (cope) करने के तरीके ढूँढ लेता है। 
आदमी वो घोड़ा नही है जिसे अन्हवट (blinkers) पहना कर हम सोचते है कि वो यहा वहा नही देखेगा। हर इंसान के पास दिमाग़ है और जिस बात को उसके लिए ट्रानसलेट नही किया गया वो उसके लिए काले अक्षर भैंस बराबर है। आज हमारे सभी ब्यूरोक्रेटिक प्रोग्राम के असफल होने का बड़ा कारण यही हाइरैरकी है। 
आज और एक नई बात सीखी। हम सोचते है की ये पावर प्ले है, पर सोचिए तो पावर हर एक के पास है। कोई हाइरैरकी के चलते आप पर कोई पोलिसी थोप सकता है पर आप उसे अनमने मन से करके उसकी पोलिसी को फ़ेल कर देते हो। पोलिसी थोपना उसका पावर है, पोलिसी फ़ेल करना आपका पावर।
(बहुत सी बाते इक्कठा कह गई! पर शायद कहना चाहती थी!)

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