ज़ेवर
औरतें कपड़े-लत्ते, जेवर, मेकअप के लिए जितना ललायित होती है काश उतना की अपने हक़ों के लिए भी होती!! वैसे इनका लालच ही तो दिखा कर सभ्य समाज का पुरुष औरत को अपनी हवस का शिकार बनाता रहा है। इसी की चाह में पत्नियाँ पति की गुलाम बनी रहती है। ऊँची वर्ग वाले पुरुष भी इसी लालच को दिखा गरीब औरतों का फ़ायदा उठाते थे। और जब औरतों की ख़ुशी इन सब से जोड़ दी जाएगी तो वो देह की ख़ुशी से भी बिलकुल अंजान रहेगी। आर्थिक रूप से स्वभिमंबी औरतें भी बाक़ी सब छोड़ अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं ताम-झाम में लगा देती है। बाक़ी बुनियादी ज़रूरतों के लिए पुरुष पर निर्भर बनी रहती है! इनके दुष्चक्र से निकलना औरतों के लिए बहुत ज़रूरी है!
सुंदरता का कांसेप्ट ही बचपन से इस तरह दिमाग में घुसेड़ दिया जाता क्या करे ?
सुन्दर क्लिप वाली लड़की सुन्दर
लाली वाली पर लड़के लट्टू
माँ बाप ही लड़कियों की तरह रहने को कहते
At the end they want this love and attention which they can't find for themselves as a woman
महिलाओं के स्थानीय गाने सुन कर उनका आंकलन कर रही थी। सब के सब गाने इन्हीं पर होते है। दलित महिलाओं के शोषण पर तो बहुत लिखा गया है पर यहा तो महिलाएँ जाट/गूजर्र के छोरे से संबंध के बदले जेवर बनाने के गाने गाती है। उसे नीम के नीचे आने का आमंत्रण देती है। ये गानों में है वो भी बहुत ही explicit sexual action के साथ। मेरे लिए भी बहुत shocking था शुरु में औरतों का ऐसा खुलापन देखना। ये बात स्टेटस पर नही लिखी, चढ़ जाते दलित पुरुष।
ज़ेवर - औरतों की मति मारने के लिए बनाए गए है। अभी पेरियार का अनुवादित लेख में जब ज़िक्र देखा तो मान गई। बचपन से मुझे ज़ेवरों से ख़ास नफ़रत थी। दादी दादा तो सख़्त पाबन्द थे पर जब ननिहाल जाना होता तो मौसी अक्सर टोकती कितनी सादी है और कुछ ज़बरदस्ती पहना देती, जो ज़हरीले साँप जैसे लगते। शादी के बाद ये काम जिठानियो का हो गया। बड़ी खीज होती जब अपना उतार के पहना देती। जैसे लगता उनके बोझ तले दबी जा रही हूँ।
सोचती हूँ कि क्यों ज़ेवर पहने जाते है तो यह मुख्य बातें आती है।
१- सुन्दर लगना और अपने मर्दों को रिझाना। कहते है इससे अपना मर्द बस में रहता है। नहीं तो पता नहीं कहा मुँह मारता फिरे!
२- शादीशुदा होने की निशानी, मंगलसूत्र, बिछिये, चूड़ी, वगैहरा! मर्द को शादीशुदा दिखने की कोई ज़रूरत नही।
३- आपकी संपन्नता की निशानी। कितना ज़ेवर, क्या मिला, क्या दिया। सो औरत शो पीस है मर्दों के बेन्क बैलैन्स की!
४- आख़री सबसे अहम बात यह कि ज़ेवर और उन पर बातें महिलाओं का ज़्यादातर समय खाती है। जब उसको ठूँठ बना दोगे तो क्या उसका कोई और अस्तित्व होगा?
अब इसका चलन कम हो गया है, पर कल किसी अज़ीज़ की पत्नी को ज़ेवर से लालायित होता देख, मन में यह पूछने को किया, इनका औचित्य? पढी लिखी औरतों को भी जब ज़ेवर पर पागल होते देखती हूँ तो उन पर बड़ी दया आती है।
आज पेरियार के जन्मदिन पर यह स्टेटस फिर याद आ गया। वैसे औरतों की मति मारने के लिए और भी कुछ बातें है जैसे:
१. तुममें और सम्पत्ति में कोई फ़र्क़ नहीं है। इसलिए तुम्हारा सम्पत्ति पर कोई अधिकार नही। शादी करलो तो तुम पति की सम्पत्ति। नहीं तो दर दर भटको! डिगनिटी में रहना हो तो शादी करके किसी की प्राइवेट प्रोपर्टी बन जाओ, या पब्लिक प्रोपर्टी हो तो किसी मर्द का घेरा करवा लो।
२. तुम्हारे मुँह में ज़बान तो है पर उसको चलाने की 'मर्यादा' फ़िक्स है। तुम्हारी ऊँचाई तुम्हारे विचारों की स्वच्छंदता नही, तुम्हारे इन द बाॅक्स क्रीयेटिविटी की है। मौसम पर लिखो, राजनीति पर लिखो कुछ भी लिखो पर पर्सनल नहीं लिखो। अगर किसी महिला के ख़िलाफ़ अन्याय हो रहा हो तो पक्का वो ही कुलक्षणी होगी, दूर रहो उससे।
३. तुम्हारी सुरक्षा करना मेरा कर्तव्य है। तुम को कोई पराया छू लेगा तो तुम अपवित्र हो जाओगी। सिर्फ़ मेरा तुम्हारे जीवन में होना तुम्हें सामाजिक सुरक्षा देगा।
४. ये बेवक़ूफ़ होती है। इनको झूठी तारीफ़/ इज़्ज़त या सामाजिक बहिष्कार का सबसे ज़्यादा असर होता है। इनकी कमज़ोरियों को जानो और उन्हें इनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल करो। अगर बात न बनें तो इनको डरा कर, धमका कर काम चलाओ।
किसी ने 'असली बहिस्ती जेवर' पढ़ी है? ये लड़कियों का सबसे ज़रूरी जेवर समझा जाता है। गांव देहात के मद्देनजर लिखी गयी है यह किताब,और बहुत से मामलों में बेहतर है,लेकिन इस्लामी तौर पर बहुत बड़ी नही मानी जाती है। इसमें लड़कियों को पति के लिए तैयार होने की हिदायतें है! सेक्स एड्यूकेशन कह सकते है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें