मुश्किल समय (कोविड)
पहले से ही बोलना चाहूँगी कि हो सकता है मेरी ये पोस्ट काफ़ी लोगों को पसंद न आए पर लगा ये ज़रूरी है इसलिए लिखूँगी। लम्बी होगी पर पढ़ लीजिए क्योंकि ये बिलकुल समकालीन मुद्दे पर है।
आज से लगभग अस्सी साल पहले 1943 में बंगाल में भुखमरी (famine) हुई थी। उसका कारण न तो अनाज की कमी थी और न ही ग़रीबी। उसका कारण एक कृत्रिम कमी थी जो लोगों द्वारा ही बनाई गई थी। जो भी अर्थशास्त्र के छात्र होंगे वो माँग पूर्ति स्थिति को समझते होंगे। वो जमाख़ोरी को भी बेहतर तरीक़े से जानते होंगे। कितनी भी सरकार को गाली दे दीजिए पर ये जान लीजिए कि कोई भी संसाधन कभी भी असीमित नहीं होते!
जमाख़ोरी शब्द सुनने में बड़ा नकारात्मक लगता है पर हम सब इसके दोषी रहे है, और ये बिल्कुल स्वाभाविक है। सोचिए जब नमक जैसी वस्तु के ख़त्म होने की खबर से दहशत फैलाई जा सकती है तो बाक़ी सब का क्या ही कहना। अब ये खबर आप को मिली तो आप क्या करेंगे बग़ल की दुकान ने तुरंत जा कर उसके पास के आखरी बचे दो पैकेट ख़रीद लेंगे चाहे आपके पास दस दिन के लिए नमक हो। आपको इस बात का तनिक भी आभास नहीं होगा कि अगले ही पल जो बेहद ज़रूरतमंद ग्राहक उस दुकानदार से नमक लेने जाएगा वो नमक न मिलने पर क्या करेगा? वो उस दहशत को और आग देगा। पर आप अपना नमक ज़रूरतमंदों को बाँटने तो जाएँगे नहीं! (उदाहरण Manjeet Singh के सौजन्य से)
अब नमक तो फिर भी बर्बाद नहीं होगा, फेबीफ्लू, रेमडिजिवॉर और ऑक्सीजन सिलेंडर का तो रीयूज ही नहीं है! न जाने कितनों ने कितनी ख़रीद कर इकट्ठा कर रखी है। बिना डॉक्टर के हिदायत के कुछ भी लेना ग़लत है। इसी तरह बिना डॉक्टर के प्रेसक्रिप्शन के किसी के भी पोस्ट पर मदद करना भी ग़लत हो सकता है। स्वास्थ्य संसाधनों का सही से प्रबंधन का काम सरकार का है। जिन्होंने जमाख़ोरी की है उसका प्रतिघात कोई और झेल रहा है। किसी की ऑक्सीजन न मिलने से मौत हो गई तो वही अगर एक महीने में जितने बिके है उनका उपयोग पचास फ़ीसदी भी नहीं हुआ होगा!
ऑक्सीजन की डिमांड बढ़ने का एक बड़ा कारण बाज़ार में आसानी से मिलने वाला ऑक्सीमीटर है। जैसे ही कम लगे आप के साथ आपके परिजनों का स्ट्रेस लेवल ज़रूर बढ़ जाता है। पिछले साल जब जानकारी का अभाव था तो ऑक्सीजन की इतनी माँग भी नहीं थी।
बेहतर होगा जब तक हो सके प्राकृतिक तरीक़ों से कोरोना का प्रबंधन कीजिए। ऑक्सीजन के जगह Pronal या ventilator breathing के बारे में बता सकते है।
इसी तरह दोनों दवाई जिनकी कमी है वो भी रामबाण ईलाज नहीं है। जब ज़रूरत हो डॉक्टर के हिदायत पर ही ख़रीदें।
जो बचे हुए है वो अपनी प्रतिरोधक क्षमता को दुरुस्त रखें। रोज़ व्यायाम करें, अच्छा खाए और बालकनी में दो घंटा धूप लें! मास्क पहने और बाहर का कुछ भी छूने के बाद हाथ ज़रूर धोए। होम डिलीवरी भी रखवा लें, कुछ देर में सैनिटाइज कर इस्तेमाल करें। इसे आदत बना ले।
डर और दहशत फैलाने में योगदान न दे। सरकार को काम करने दे। सरकार निकम्मी है पर हम उसमें गलती कर अपना योगदान न दे। हो सके तो उनकी मदद करें। बूरा वक़्त है इसमें संयम, समझदारी और सही जानकारी ही हमें इस विपदा से उबार पाएगी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें