लड़की की गलती
बलात्कार! रेप!
हम में बहुत है जो इस वाक्यों से निकल कर बाहर आए है। मैं औरों के बारे में नहीं कह सकती पर निजी अनुभव से कह रही हूँ हादसे कोई भी हो हम पर उसका असर शारीरिक से ज़्यादा मानसिक होता है। और मानसिक असर पूरी तरह इस पर निर्भर करता है कि समाज उसे कैसे देखता है। जैसे अगर लड़की बेरोज़गार होती है तो उसपर वो दवाब नहीं रहता जो लड़कों पर होता है।
रेप को इज़्ज़त से जोड़ हमने उसे और भयावह बना दिया है। इसी लिए कमजोर पुरुष भी रेप कर अपना पावर दिखा कर खुद को खुदा समझने लगता है। रेप कोई अजनबी करता है तो इतना भारी सदमा होता है। लड़की भी पूरी तरह खुद को झोंक देती है अपनी इज़्ज़त बचाने में। होने के बाद सबमें इतना सारा आक्रोश भी दिखने को मिलता है। पर जब अपना पति, बॉयफ़्रेंड या रिश्तेदार करता है तो अकसर समाज ही उसे नज़रअंदाज़ करता है। जिसे नज़रअंदाज़ किया जाता है वही इन वहशियों को शह देता हैं कि अजनबियों के साथ वही दरिंदगी दोहराई जाए!!!
जब मैं अलग-अलग प्लैटफ़ॉर्म पर महिला सुरक्षा की बातें सुनती हूँ तो मुझे बहुत ही काउंटर प्रोडक्टिव बातें लगती है। पुरुषों की सोच बदलने का प्रोजेक्ट इतना बड़ा लगता है कि सुरक्षा के बैंड एड से काम चलाते हैं ताकि कुछ देर की शांति हो जाए। वैसे भी अगले बड़े रेप तक सबको सो ही जाना है। हम नहीं सुधरेंगे!
मेरा केसः बलात्कार हमारे समाज का एक भयावय सच हैं. १९ साल की उम्र में जब मेरे साथ ये हादसा हुआ, तो मैंने चुप्पी का रास्ता अपनाया. शायद बहुत कमजोर थी. न अपनी दिवंगत छोटी बहन की तरह हिम्मत थी जिसने आत्महत्या करने की कोशिश की, और न ही निर्भया की तरह हिम्मत की अपनी जान की परवाह करते बगेर लड़ाई लड़ती और न ही मुख़्तार मई की तरह समाज से लड़ने कि हिम्मत. हर लड़की या लड़का जो इस हादसे का शिकार होता हैं और अगर बच जाता हैं अपनी बुजदिली की वजह से, तो शायद इसलिए क्योंकि वो इस हादसे के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानने लगता हैं! हम जैसे बुजदिलो कि वजह से ही समाज में भेड़ियों का इजाफा होता रहा हा! और भेडिये जब एक बार खून चख लेते हैं, तो न जाने कितने और उसी हादसे का शिकार होते हैं...
केस १: 8 दिन के बाद हुए मेडिकल में कौन से बलात्कार के साक्ष्य बच जाते है!
मैंने भी एक गैंगरेप की विक्टिम लड़की का मेडिकल करवाया था चार महीने बाद। लड़की का एक महीने उसके पति और उसके दोस्तों द्वारा गैंगरेप हुआ था। पति लगातार नशे में रखता था। बेहोशी के हालत में पाई गई तो तीन दिन सरकारी अस्पताल में भर्ती थी। सरकारी अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट पेट में मार पीट की बनी। गाइनोकोलोजिस्ट ने रेप की जाँच इसलिए नहीं की क्यों कि पहली बात सिर्फ़ NCR हुई थी मार पीट की, दूसरा कि वो शादीशुदा है जबकि उसकी माँ ने बताया कि उसकी ब्लीडिंग बंद नहीं हो रही थी तो डॉक्टर ने जाँच की और दवाई दी। पंद्रह बीस दिन ब्लीडिंग चली। पर पूरा सिस्टम बिना पैसे लिए बिका हुआ था। रेप के ज़्यादातर हर केस का यही हश्र होता है!
लड़की से मैं तीन महीने बाद मिली और उसके साथ हुई दरंदगी का पता चलते ही मेडिकल करवाया। पता चला पूरी तरह से हील हो चुकी है!
केस २ः आज भी वही पाराशर ज़िंदा है और वही मस्यगंधा! न्याय क्या है? उसका सत्यवती बन जाना या पाराशर और उस जैसों को उनके किए की सजा देना!
जाति जेंडर के साथ घुल कर जो घिनौना रूप लेती है हम उसे नकारने में महारत हासिल कर चुके है। सवर्ण पुरुष सॉलिडेरिटी की मलाई खाते है, उनकी औरतों ने उनका साथ दे कर तो भारतीय फ़ेमिनिस्ट आंदोलन का भद्दा मज़ाक़ उड़ाया ही है! दलित बहुजन पुरुष तभी बोल पाते जब कोई डेल्टा मेघवाल मर जाती है। दलित बहुजन औरतों को लड़ाई खुद लड़नी होगी!
स्पेशल सेल फ़ॉर विमैन इसी मक़सद से बनाए गए कि लड़कियाँ/ औरतें बिना किसी डर घरेलू हिंसा की तो कम्पलेंट करे। शोशल वर्कर का यहा काम बहुत ज़रूरी है। पर अभी ये देश में बहुत ही शुरुआती स्टेज पर है।
औरत का मुद्दा हो घर का या बाहर का जिससे पूछो सबके पास एक इलाज है चुप हो कर पहले शोषित की काउंसिलिंग की जाए। उसे वापस खड़ा करना ज्यादा ज़रूरी है। जो दोषी है उसे इगनोर करो। मेरा प्रश्न सिर्फ एक है, कब तक? क्या दोनो नही हो सकते? समाज में बदलाव चुप्पी से तो कभी नही हो सकता!
लड़की मार दी जाती है तो जरूर हो हल्ला होता है पर न्याय? न्याय लडकियों को खुद खड़े हो कर लेना पड़ेगा। दलित बहजन लडकियों को इतना सक्षम बनाए की वो खड़ी हो सके नही तो समय चक्र मे अगला नम्बर आपके अपनों का होगा! #JusticeForDelta
केस ३ः शर्मिंदा हूँ की हम शर्मिंदगी को बेच रहे हैं...
"दिल्ली के सामूहिक बलात्कार पर भारत में रचनाकारों व कलाकारों ने भले इस मुद्दे को लेकर जनता की राय बनाने की कवायद शुरू की हो, न की हो; किन्तु उस दुर्घटना पर दक्षिण अफ़्रीका के नाटककार यैल फार्बर द्वारा लिखित व निर्देशित नाटक ने ब्रिटेन के 'एडिनबरा कला महोत्सव' में अत्यंत प्रशंसा पाई व सनसनी फैला दी, भीड़ मानो इस नाटक को देखने टूट पड़ी। 'डेली टेलीग्राफ' ने इसकी समीक्षा में लिखा - "It is one of the most powerful pieces of theatre I have ever seen."
निर्भया के बहाने यह भारतीय स्त्री की, छह पात्रों के माध्यम से, छह तरह की हिंसक यंत्रणाओं की कहानी कहता है। भारत की छवि विश्व में इस समय "बलात्कारों वाला देश" के रूप में स्थापित हो गई है।
पुरुषों पर इसका दारोमदार है कि वे इसे और कितना कलंकित करना चाहते हैं तथा और कितनी स्त्रियों का रक्त पीना चाहते हैं !! स्त्रियों के पास अपने देश के पुरुषों पर शर्मिंदा होने के अतिरिक्त शेष कुछ नहीं छोड़ा गया है ....."- डॉ कविता वाचकनवी
केस ४ः सीमा पंद्रह की थी तो उसकी शादी पास के गाँव में एक बेरोज़गार लड़के से कर दी। दोनों लड़का लड़की अनपढ़ है और जाटव समाज के है। आधार में उसकी उम्र २१ लिखवाई है। सास के पास कुछ ज़मीन थी जिस पर खेती करती थी। शादी करके पहुँची तो पति को कही जाना पड़ गया। पति के जाने के बाद देवर ने उसकी सास के सामने उसके साथ बलात्कार किया। चार दिन बाद भाई आया तो मायके चली गई। माँ को बताया तो माँ नारी अदालत में पहुँची। नारी अदालत ने पति को बुला कर मामला निपटाया और एफीडेविट ले कर तय हुआ की पति अलग किराए पर उसे रखेगा। दो महिने बाद फ़ॉलोअप के लिए कुछ सहयोगिनी और कार्यकर्ता पहुँचे तो उन्होंने पाया की उसने विपरीतलिंगी (ट्रांसजेंडर) के टोली में बहुत ही छोटे से कमरे में बेहोश पड़ी थी। देखने पर पता चला की नशे में है और कपड़े बार-बार हुए बलात्कार की वजह से सने हुए थे। (मुझे उड़ता पंजाब की आलिया याद आ गई)
महिला सामख्या ने पुलिस के कहा तो वो इस टोली में आने को आना कानी करनी लगी। ट्रांसजेंडर लड़की को वहाँ से ले जाने नही दे रहे थे। तो झूठमूठ एसपी पुलिस से बात करने का नाटक कर उनपर दवाब डाला गया। फिर लड़की को उठा कर पुलिस थाने ले गए। वहाँ पति और ट्रांसजेंडर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर करवाई। दलाल एफ़आईआर न करने के पचास कारण बता रहे थे।
लड़की को फिर महिला कांस्टेबल के साथ सरकारी अस्पताल ले जाया गया जहा रात ग्यारह बजे तक जाँच हुई। सीएमओ के दवाब के बावजूद वहाँ का स्टाफ़ ड्रीप लगाने के पैसे माँग रहे थे।
सीमा की माँ जो उसके साथ थी उसे लगा की अस्पताल में खाना नही मिलता तो खाने के लिए परेशान थी। उसे समझाया गया की फ़्री में खाना है और से तो पुलिस केस है। तीन दिन बाद लड़की ठीक हुई तो उसकी माँ को समझा कर सीमा को उसके साथ भेज दिया गया।
नशा बेरोज़गारी दोनों एक दूसरे के पूरक है और महिलाओं के शोषण का एक बहुत बड़ा कारण। शिक्षा और जानकारी का अभाव अलग। ट्रांसजेडर की स्थिति अपने में बहुत ख़राब है और उनको देह व्यापार और भीख माँगने के लिए समाज ने छोड़ रखा है!
(महिला महासंघ में ये साझा हुआ पुलिस केस है और नाम बदल दिया गया है)
केस ५ः प्रधान: हमारे यहा बलात्कार हुआ है। केस का तो निपटारा कर दिया पर ये तो हमें रजिस्टर में लिखने में शर्म आती है।
हम(कुर्सी प्रधान के नज़दीक करते हुए): हमें बताइए हम लिख देते है।
प्रधान: मैडम बहुत अधिकार मिल गये महिला को, रात को तीन बजे उठ कर ग़ैर मर्द को हाथ पकड़ कर ले जा रही थी। पक़डी गई तो पंचायत करनी पड़ी।
हम: ये तो दोनों की आपसी सहमती है। बलात्कार तो तब कहते है जब किसी के बग़ैर सहमती के ज़बरदस्ती की गई है। ४९७ धारा भी नही रही की पति उस लड़के पर केस करे। ये उनका आपसी मामला है। पंचायत करने की क्या ज़रूरत है। चुप रहिए बेहतर है सबके लिए।
काफ़ी देर गाँव की महिलाओं से हो रही बात को सुनते हुए..
प्रधान: आप महिलाओं का साथ देंगी तो मुझे पुरुषों का साथ देना पड़ेगा!
हम(उसकी दुखी बीवी के तरफ देखते हुए): फिर तो आने से रही कोई महिला आपके पास हिंसा में मदद के लिए। आपकी बीवी भी अब जल्द हमारे पास आऐगी!
बलात्कार का कारण सेक्स की भूख नही हो सकती। ये ख़ुद को ताक़तवर साबित करने का असुरक्षित और कमजोर लोगों का एक हथियार है। बिलकुल वैसे ही जैसे कोई बड़ा एक असहाय बच्चे को पीटना अपना हक़ समझता है।
क्या अब बलात्कार नही होंगे? ये भी छोड़िए क्या ब्लात्कार में कोई गिरावट आएगी??
बिलकुल नही। क्योंकि बलात्कार सत्ता से जुड़ा है और सत्ता का नशा बिना समाज के स्वरूप को बदले कुछ एक केस में फाँसी देने से नही बदलेगा! समाज की जड़े हिलानी होगी तब कुछ गिरावट आएगी। उसके लिए लड़की और लड़के के भेद को बिलकुल ख़त्म करना होगा! तैयार है हम??
बड़ा अजीब ख़याल है। पर सोचा रखने में क्या हिचक।
पुरूष प्राकृतिक तौर से ताक़तवर बनाया गया है। अगर जानवरों में देखा जाए तो नर यह ताक़त दूसरे नर को परास्त करने मे लगाता है। मादा के साथ ज़बरदस्ती भी शायद होती है पर वो इतनी विभस्त नहीं होती।
पर इन्सानी बलात्कार और ज़बरदस्ती के पीछे की मानसिकता को जानना ज़रूरी है।
१. किसी लड़के का अच्छी लड़की को अपनाने का ख़याल बहुत स्वभाविक है। पर उसको पाने का तरीक़ा क्या है? लडकी की ना पर वो हताश हो जाते है और उसका जवाब एसिड ऐटैक या ब्लातकार से देते है। बदले की भावना में लड़कों कि समझ तेल लेने चली जाती है!
२. पुरूष ज़बरदस्ती दो सूरत में करते है। पहला जब उसे सिर्फ़ क्षणिक सुख भोगना है। उसे उस लड़की से कोई लेना देना नहीं होता। दूसरा जब उसे पता होता है कि लड़की के पास कहीं और जाने का चारा नहीं है।
३. सभी सूरत मे बलात्कारी को डर नहीं होता क्योंकि उसे ये अंदाज़ा होता है कि लड़की चुप रहेगी या वो पकड़े नहीं जाएँगे। पकड़े भी गए तो बच जाएगे!
४. बलात्कार हमारे कुंठित समाज की हक़ीक़त है। अगर लड़कियों को घर में बंद रखा जाएगा तो लड़कों की लड़की को देखने, छूने की लालसा और बढ़ेगी। ये कुंठा और खुद के ताक़तवर होने का अहम अक्सर ब्लात्कार करवाता है।
५. हो सकता है कि लड़की के किसी इशारे से लड़का ऐक्साइट तो हो जाता है पर लड़की आख़री समय में डर जाती है और कौन्सैकसुअल की जगह वो बलात्कार बन जाता है।
आपको कोई और पहलू नज़र आता है तो खुल कर बताए। मैं और आप साईकोलौजिस्ट हो यह ज़रूरी नहीं अपनी सोच शेयर करने के लिए। हमारा और आपका खुलापन ही इस गंदगी को समाज से हटा सकता है।
बलात्कार ज़रूरी नही ज़बरदस्ती ही हो। धोखे से किया हुआ सेक्स, सेक्स के बीच में कॉन्डोम हटा लेना, या फटा हुआ कॉन्डोम पहनना, शादी या हमेशा साथ देने के वादे के एवज़ में किया सेक्स, वो सब जो सहमती के बाहर हुआ हो सभी को बलात्कार के परिभाषा में लाना ज़रूरी है!
अपराधियों को क़ानून का कोई डर नहीं है जिसका ख़ामियाज़ा बहनों को अपमानित हो और बेइज्जत हो कर चुकाना पड़ रहा है! ~चंद्रशेखर (भीम आर्मी)
जब तक बलात्कार को लड़कियों/ औरतों के मान और इज़्ज़त से जोड़ा जाएगा तब तक औरत को बलात्कार का ज़िम्मेदार माना जाएगा! इसे सिर्फ़ एक हादसा माना जाना चाहिए!
दलित और ग़रीब मज़दूर औरतों की स्वच्छंदता ही उनको यौन-सम्बंध के लिए उपलब्ध होने की अवधारणा और हिंसा के प्रति आघात योग्य बनाता है! इनके साथ छेड़छाड़, बलात्कार और हत्या के हर मामले में ये लोकल गुंडे, ज़मींदार, मकानमालिक, नेताओं के हत्थे चढ़ती है। एक तरफ जहा ये समाजिक हिंसा की शिकार होती है वही दूसरी तरफ स्वर्ण औरतों को परिवारिक हिंसा का ज्यादा सामना करना पड़ता है। वो परिवार जो उनकी सुरक्षा के नाम पर ही सबसे ज्यादा बचाता है वही उनके साथ हिंसा करता है। इसी लिए यदि कोई स्वर्ण बाग़ी होती है तो वो ऑनर किलिंग के हत्थे चढ़ जाती है। इसी तबके मे सबसे ज्यादा कन्या भ्रूणहत्या होती है और दहेज में बहुएँ जलाई जाती है!
एक बहुत ज़रूरी बात ये है की बहुत से दलित और पिछड़े पुरुष स्वर्ण पुरुषों से प्रेरणा ले कर औरत पर परिवारिक हिंसा भी शुरु कर रहे है। इन्हे इसी से बच कर रहना है नही तो वे दलित पिछड़ी औरतों के अस्मिता की लड़ाई को बहुत ही मुश्किल बना रहे है।
समाज मे पुरुषों के व्यभिचार के लिए मैं काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार माँ, बहन और पत्नी को मानती हूँ। वो जो पितृसत्तात्मक समाज का हिस्सा बन चुकी है। उनकी इनसेक्यूरिटी और कमज़ोरी की शिकार न जाने कितनी और होती है! खुद भी बची नही रह पाती है, क्योंकि उनका दिल जो कहता है वो उसको मानने से इंकार करती रहती है।
माँ अपने पल्लू मे बेटे को हमेशा छिपाए रखती है, बेटा कुछ भी क्यो न कर दे। होगी किसी की बेटी, गिरी हुए थी, मेरे बेटे ने उसका रेप कर उसे उसकी जगह दिखा दी। समाज सुधारक है मेरा बेटा। सफाई कर रहा है समाज की!
बहन को लिए भाई वो है जो उसकी इज़्ज़त बचाने के लिए दो चार का बलात्कार कर दे तो क्या बुरा है। किया भी तो बहन के लिए न, कितना ख़्याल रखता है!!
पत्नी के लिए पति तो दूध पीता बच्चा है, लड़कियाँ फँसा लेती है, मैं तो उसे पहले ही कह रही थी की वैश्या है, दूर रहे नही तो फँस जाएगा। बाकी मैं उसकी ज़िम्मेदारी हूँ कितना भी व्यभिचारी क्यों न हो, शादी की है, निभाना मेरे साथ ही पड़ेगा!! कही भी मुँह मार लौट के मेरे पास आएगा!
पितृसत्ता तो अकसर औरतों के हाथों ही क्रियान्वित होती है! आदमी तो सिर्फ नियम तय करता है और मूक हो कर उसे बढ़ावा देता है!
खुद को और अपने बच्चों को इतना निर्भीक और दिलेर बनाओ कि पहले तो ऐसे हादसों का डटकर सामना करें. और अगर हादसा हो भी जाए तो चुप्पी के रास्ते कि जगह, उसे समाज के सामने रखो और समाज से ही जवाब मांगो!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें