ख़ोज

मेरा पहला ब्लॉग 'आपके लिए' मेरे निजी अनुभवों से जुड़ा हुआ हैं। शायद इसलिए कि पहले खुद को समझना जरुरी होता हैं, समाज को बेहतर समझने से पहले।  पहली ख़ोज भीतर थी, अब ये ख़ोज बाहर की हैं, पर समय समय पर में अन्दर और बाहर को जोड़ कर देखूंगी क्यूंकि ये वैसे भी जुड़े हुए हैं।
मेरे कैवल्य फाउंडेशन में लगभग एक साल मेरे सामाजिक क्षेत्र में पहला काम था। वहा का अनुभव, ज्यादा खुद अनुभव करने से ज्यादा दूसरों के अनुभव का दस्तावेजिकरण था। फिर भी RTE के तहत सरकारी शिक्षा तंत्र को बेहतर समझने का मौका मिला। वहाँ के अनुभवों पर भी जरुर लिखूंगी। मुंबई में टाटा इंस्टिट्यूट में फील्ड वर्क में जो अनुभव किया उसके दस्तावेज हैं, उसे हिंदी में अपनी भाषा में जरुर लिखूंगी। इसके बाद लगभग एक ढेड़ महीने भारत भ्रमण किया जिसका अपना अनुभव था। इसके बाद सहारनपुर में महिला समाख्या के साथ का अनुभव भी हैं जिसपर समय समय पर लिखती रहूंगी।  
मेरी कोशिश रहेगी की लगातार लिखती रहूँ ताकि सामाजिक ताना बाना के अनुभवों को कैद कर सकूं।  मानव समाज अपने में बहुत जटिल हैं, इसके एक एक तार को खोल खोल कर देखने पर ही हम इसे बेहतर समझ पायेंगे। मेरे सभी पोस्ट मेरे क्लाइंट के निजता और गोपनीयता का पूरा ख्याल रखेंगे। मेरी ये भी कोशिश रहेगी की व्यक्ति से ज्यादा सामाजिक पहलु पर बात हो। और इसे समझने के लिए महिलाओं के निजी अनुभव जानने बहुत जरुरी हैं।  नारीवादी सोच के अनुसार महिलाओं के अनुभव को ही केंद्र में रखा गया हैं।   
जाति, धर्म, लिंग और लैंगिकता के आधार पर कोई फैसले नहीं लुंगी।  सभी सर्वप्रथम पहले इंसान हैं फिर कुछ और। पर संस्कृति को देखते हुए मैं जाति के नज़रिए से देखूंगी जिसे जातिवाद के दायरे में नहीं लाया जा सकता। जाति की संकृति की समझ से उस जाति के आज का सामाजिक स्वरुप, समाज का ताना बाना और सामाजिक बुराई और अनियमिताएं बेहतर समझ पायेंगे।  
मेरे इस ख़ोज में मेरे साथी बन साथ चलने का वादा कीजिये, बहुत कुछ हैं जो हमें बेहतर बनने का मौका देंगे। बस गुजारिश हैं की अपनी टिप्पडी से हमारा हौसला बढाएं ताकि हमारी सबकी बेहतर समझ बन सकें। 

बिना नॉन जजमेंटल रिसर्च के जो भी लिखा जा रहा है, अकसर बहुत ही भ्रमित करता है। जो भी पॉवर मे है वो अपने पोजिशन को सही मान कर किसी को भी नीचा और ख़ुद को ग्लोरिफ़ाई करता है। बहुत बार ख़ुद को विक्टिम दिखाने को लिए जो विक्टिम नही है उसे भी आप विक्टिम पोट्रे कर देते हो। इससे दुश्मन ज्यादा पावरफुल दिखता है। EH Carr की What is history बहुत पहले पढ़ी है पर मुझे हमेशा प्रेरणा देती है। 

Any piece of writing which is often written without non-judgmental research is often quite misleading. Most writings which get published are from a position of power, often trying to pull someone weaker down and glorifying oneself. Many a times the writer portrays non-victims as victims to make the enemy appear more powerful. Whenever faced with such contradictions I find solace in EH Carr's book, what is history.

कोई भी लेखक, जर्नलिस्ट, रिसर्च कितना भी बिना पक्षपात को लिख रहा हो अपना नज़रिया डाल ही देता है। पर किसी के नज़रिये को चाहे वो कितनी भी विपरीत आलोचना क्यो हो या सच्चाई को तोड़ मड़ोड पर पेश किया हो, उसे भी एक अलग नज़रिया मान कर स्वीकारने की ज़रूरत है।

No writer, journalist or researcher can write totally independent of his own bias. Criticism and misinformation of facts and realty need to be taken just as an alternative viewpoint.

सच की खोज कभी ख़त्म नही होती। तो इंसानों के किसी भी साहित्य के टुकड़े को खुदा का लिखा मानना अपनी तर्क शक्ति को सुन्न कर देना है। ये जान लेना की जो भी लिखा गया है हो सिर्फ लेखक का नज़रिया है हमें सच के नज़दीक ले जा सकता है।

The search for truth never ends. Those who assume one piece of literature as God's word have numbed their reason. There are multiple versions of truth and only accepting that will help us get closer to truth.

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